एक बार एक युवक महादेव गोविंद रानाडे के पास आया। वह सामाजिक कुरीतियों से अत्यंत आक्रोशित था। उसने कहा, ‘जब तक हम पुरानी परंपराओं को पूरी तरह तोड़ नहीं देंगे, तब तक प्रगति संभव नहीं।’ रानाडे ने शांतिपूर्वक उसे पास बैठाया और पूछा, ‘यदि एक पुराना घर जर्जर हो जाए, तो क्या तुम उसे गिराकर खुली जमीन पर बैठ जाओगे, या पहले नया आधार तैयार करोगे?’ युवक कुछ क्षण चुप रहा। रानाडे ने समझाया कि सुधार का अर्थ केवल विरोध नहीं, निर्माण भी है। उन्होंने विधवा-विवाह, स्त्री-शिक्षा और सामाजिक न्याय के लिए कार्य किया, परंतु हमेशा संवाद और कानून के माध्यम से। वे मानते थे कि समाज की जड़ें गहरी होती हैं; उन्हें झटके से नहीं, समझदारी से बदला जा सकता है। न्यायाधीश के रूप में भी उन्होंने निष्पक्षता को सर्वोपरि रखा। कई बार व्यक्तिगत विचार अलग होने पर भी उन्होंने कानून और तर्क के आधार पर निर्णय दिए। उनके लिए पद प्रतिष्ठा नहीं, उत्तरदायित्व था।
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