मीरा बाई का पद ‘सत की नाव खेवटिया’ भक्ति और भगवान के प्रति अडिग विश्वास को दर्शाता है। इस पद में मीरा ने सतगुरु की महिमा का वर्णन किया है, जो भक्तों को भवसागर से पार लगा देते हैं। मीरा का मानना है कि राम का नाम जपने से पाप समाप्त होते हैं।
रामनवमी आती है तो अयोध्या में भगवान राम के नाम और उनसे जुड़े स्थलों की महिमा गाने वालों की बहार आ जाती है। कोई उनको घट-घटवासी, दीनदयालु और निर्बलों का बल बताता है, कोई आदर्शों व मर्यादाओं की विविधवर्णी व बहुआयामी छवियों से मंडित परम आराध्य तो कोई भक्तों, संतों व अनुयायियों के हृदयों में बसी, परम्परा से चली आती और हर किसी के लिए आश्वस्तिकारी छवियों की चर्चा करता है। इस बीच समूची अयोध्या में ‘भये प्रगट कृपाला दीन दयाला कौसल्या हितकारी’ का कर्णप्रिय उद्घोष होता रहता है।
अयोध्या के प्रतिष्ठित संत कौशलकिशोर दास फलाहारी, कहा करते थे कि भगवान राम के भक्तों, संतों व अनुयायियों के हृदयों में उनकी कोई भी छवि किसी और द्वारा नहीं बसाई जा सकती। हां, इन सहृदयों को उनके राम की ओर से इसकी अगाध छूट हासिल है कि वे उनकी जिस भी छवि को चाहें, उसी के हो लें। अपनी भावनाओं के अनुसार ‘अपने’ राम की कोई नई ‘मूरत’ गढ़ लें, तो भी कोई हर्ज नहीं। इसीलिए भगवान राम किसी के लिए ‘रघुपति राघव राजा राम’ हैं, तो किसी के लिए धनुर्धर, वल्कलवस्त्रधारी या वनवासी और किसी के लिए ‘पतितपावन’। इतना ही नहीं, वे किसी के पिउ हैं तो कोई उनकी बहुरिया। संत कबीर तो कभी एलानिया कहते हैं कि ‘हरि मोर पिउ मैं राम की बहुरिया’ और कभी उनके हरि उनकी जननी हो जाते है— ‘हरि जननी मैं बालक तोरा।’
अयोध्या में तो एक ऐसा सम्प्रदाय भी है जो सखा और सखी भाव से राम की उपासना किया करता है। ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम’ का उद्घोष करने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की बात करें तो उनके निकट वे पतित पावन भी हैं और सबको सन्मति प्रदान करने वाले भी।
रामकथा न सिर्फ भारत, बल्कि अखंड भारत की सीमाओं से भी परे, दुनिया के 63 देशों में कही जाती है। इंडोनेशिया, थाईलैंड और फिलीपींस समेत ये सारे देश हिन्दुबहुल न होकर दूसरे धर्मों व सम्प्रदायों के अनुयायियों से भरे पड़े हैं। इनमें से कई में रामकथाओं का मंचन भी होता है, जिसमें अन्य धर्मावलम्बियों की प्रमुख भूमिका होती है।
फिलीपींस की रामकथा में तो इस्लाम के कई तत्वों का इस तरह समावेश हो गया है कि अब विशेषज्ञों के लिए भी अलगाना मुश्किल है कि उनमें से कौन-सा तत्व कब कहां से आया। जैसे राम की छवियों में, वैसे देशांतर की रामकथाओं में भी अनेक स्वरूपगत भिन्नताएं हैं, लेकिन ये भिन्नताएं न उन्हें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी करती हैं और न राम को अपनाने, स्वीकारने या व्यापक बनाने में बाधक बनती हैं।
प्रसंगवश, अंग्रेज़ों ने 11 फरवरी, 1856 को अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ कर गिरफ्तार और निर्वासित कर दिया तो उनके कुशलक्षेम के लिए भगवान राम से प्रार्थनाएं की गईं। इसके पीछे वह गंगा-जमुनी तहजीब थी, जिसे नवाबों ने अपने समय में लगातार सींचा। उनमें से कई स्वयं राम के उपासक थे और उन्होंने अयोध्या के अनेक मन्दिरों को दान व जागीरें वगैरह देने में खासी दरियादिली दिखाई थी।
ऐसे में कहना मुश्किल है कि संत कवियों ने भगवान राम को कितने रूपों और भावों में भजा है। सच कहें तो उनके सिलसिले में इन संतों ने भक्ति की सगुण व निर्गुण और राम व कृष्ण शाखाओं, साथ ही हिन्दू व मुसलमान का भेद पूरी तरह मिटा डाला है। गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी’ को सार्थक करते हुए। तभी तो ‘भजु मन रामचरन सुखदायी’ का आह्वान करते हुए गोस्वामी जी बेहद आत्मविश्वासपूर्वक पूछते हैं कि दुनिया में ऐसा कौन-सा ‘आरत’ (दीन व दुःखी) जन है, जिसके पुकार लगाने पर उसकी ‘आरति प्रभु न हरी।’ फिर वही क्यों, कृष्णभक्त सूरदास भी अपने मन से कहते हैं कि वह राम से लौ लगाये : रे मन राम सों करु हेत। हरिभजन की बारि करि ले, उबरै तेरो खेत। मन सुआ, तन पींजरा तिहि मांझ राखौ चेत।
यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ कहने वाली मीरा ‘अब तो मेरो राम नाम...’ भी कहती हैं और ‘पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायौ’ की घोषणा करती हुई स्वयं को यह कहने से नहीं रोक पातीं : वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु किरपा करि अपनायो। जनम-जनम की पूंजी पाई जग में सभी खोवायो। खायो न खरच चोर न लेवे दिन दिन बढ़त सवायो। सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तरि आयो। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरस-हरस जस गायो। आगे वे फिर कहती हैं मेरो मन रामहि राम रटै। राम नाम जपि लीजै प्राणी कोटिक पाप कटै।’
संत मलूकदास की राम धुन भी मीरा से अलग नहीं ही है। पहले तो वे दूसरों को ‘राम कहो, राम कहो, राम कहो बावरे, अवसर न चूक भोंदू पायो भला दांव रे!’ का संदेश देते हैं, फिर अपनी बात करते हैं— अब तेरी सरन आयो राम। जबै सुनियो साधके मुख, पतित पावन नाम। यही जान पुकार कीन्हीं, अति सतायो काम। बिषय सेती भयो आजिज कह मलूक गुलाम।
संत रैदास की रामभक्ति की पराकाष्ठा तो यह है कि उन्हें फल-फूल, दूध-द्रव्य और चन्दन समेत संसार की कोई भी वस्तु ऐसी ‘अनूप’ नहीं लगती, अपने राम की पूजा करते हुए जिसे अर्पित कर वे संतोष का अनुभव कर सकें। इस विवशता के बीच वे स्वयं राम से ही पूछते हैं—राम, मैं पूजा कहां चढ़ाऊं? फल अरु फूल अनूप न पाऊं। थन तर दूध जो बछरू जुठारी। पुहुप भंवर जल मीन बिगारी। मलयागिर बेधियो भुजंगा। विष अमृत दोऊ एक संगा।
अंततः उन्हें लगने लगता है कि ‘मन ही पूजा, मन ही धूप, मन ही सेऊं सहज सरूप’ तो इस निष्कर्ष तक जा पहुंचते हैं ‘जब राम नाम कहि गावैगा, तब भेद अभेद समावैगा।’ और ‘राम बिन संसय गांठि न छूटे। काम क्रोध मोह मद माया इन पंचन मिलि लूटै।’
इसी परम्परा में केशवदास अपनी ‘रामचंद्रिका’ में कहते हैं कि जिस पुनरुक्ति (दोहराव) को साहित्यकार बड़ा दोष मानते हैं, उसकी उपेक्षा कर वे ‘अनुदिन राम राम रटत रहत, न डरत पुनरुक्ति को’ क्योंकि यह ‘रूप देहि अणिमाहि, गुण देहि गरिमाहि, भक्ति देहि महिमाहि, नाम देहि मुक्ति को।’
भक्तिकाल से आगे बढ़ें तो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त अपने ‘साकेत’ में राम से कुछ इस तरह बात करते हैं, जैसे वे साक्षात उनके सामने खड़े हों। वे उनसे पूछते हैं ‘राम, तुम मानव हो, ईश्वर नहीं हो क्या, विश्व में रमे हुए सर्वत्र नहीं हो क्या?’
यहां भारतेन्दु हरिश्चंद्र को भूल जाना अपराध होगा, जो दशरथ विलाप के बहाने राम के प्रति अपनी आसक्ति इस तरह प्रदर्शित कर गये हैं— कहां हो ऐ हमारे राम प्यारे? किधर तुम छोड़कर मुझको सिधारे? छिपाई है कहां सुन्दर वो मूरत? दिखा दो सांवली सी मुझको सूरत। न निकली जान अब तक बेहया हूं। भला मैं राम बिन क्यों जी रहा हूं?’
दूसरी ओर निराला ने अपनी 312 पंक्तियों की ‘राम की शक्ति पूजा’ शीर्षक कालजयी रचना में जैसे अपना सारा निरालापन उड़ेल दिया है। वर्ष 1936 में अपनी इस रचना में सीता की मुक्ति के विषय को उन्होंने कुछ इस तरह उठाया कि वह गुलाम देश की हताश-निराश प्रजा को नये सिरे से सचेत कर उसमें युगीन परिस्थितियों से लड़ने का साहस पैदा करने लगा।

