श्रीकृष्ण के प्रति वात्सल्य की मूर्तिमयी देवी माता यशोदा का प्रेम अनूठा था। जब भगवान उन्हें पुत्र रूप में मिले तो वह एक सामान्य माता की भांति अपने बाल-गोपाल के लालन-पालन में पूरी लगन से निरत हो अपने जीवन के क्षण-क्षण को लुटा देना चाहती थीं। वह रात-दिन उनकी सेवा-सुश्रूषा में खोयी रहतीं। वह उनको पुचकारतीं, तरह-तरह से लाड़-प्यार करतीं और जब कभी नटखट श्रीकृष्ण उन्हें तंग करते तो वह उन्हें सजा भी देती थीं।
भगवान श्रीकृष्ण को माता देवकी ने जन्म भले ही दिया था, लेकिन उनके लालन-पालन का सौभाग्य एवं मातृत्व का सुख तो यशोदा रानी को ही मिला। संसार में ऐसे भाग्यशाली भक्त बहुत कम हुए हैं, जिनकी इच्छा के अनुसार जगत के पालक परब्रह्म भगवान ने स्वयं अपनी लीलाएं रची हों। यशोदा जी उनमें भी परम सौभाग्यशालिनी हैं कि अनंत कोटि ब्रह्माण्डों के नायक परात्पर भगवान श्रीहरि, जो शाश्वत और सदामुक्त हैं, उनके प्रेम के वशीभूत हो उनके साथ माया का बंधन स्वीकार कर लेते हैं। जो संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने वाले हैं तथा जिनकी इच्छा से ही सृष्टि का कण-कण और तृण-तृण क्रियाशील रहता है। उस परब्रह्म भगवान ने स्वयं ही यशोदा जी का पुत्र बनकर उन्हें वात्सल्य सुख का अनुपम सौभाग्य प्रदान किया। माता यशोदा के उसी परम सौभाग्य का उत्सव मनाने एवं परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण एवं भक्त यशोदा जी के उस अद्भुत एवं अनुपम संबंध को स्मरण तथा सम्मानित करने हेतु सभी सनातन धर्मावलंबी प्रतिवर्ष फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को यशोदा जयन्ती का पर्व पूरी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाते हैं। विशेष रूप सें, महिलाएं माता यशोदा को प्रसन्न कर उनसे वात्साल्य-सुख का वरदान प्राप्त करने के उद्देश्य से इस पर्व को मनाती हैं। इस वर्ष यह पर्व 7 फरवरी को बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाएगा।
अनुपम वात्सल्य की देवी
श्रीकृष्ण के प्रति वात्सल्य की मूर्तिमयी देवी माता यशोदा का प्रेम अनूठा था। जब भगवान उन्हें पुत्र रूप में मिले तो वह एक सामान्य माता की भांति अपने बाल-गोपाल के लालन-पालन में पूरी लगन से निरत हो अपने जीवन के क्षण-क्षण को लुटा देना चाहती थीं। वह रात-दिन उनकी सेवा-सुश्रूषा में खोयी रहतीं। वह उनको पुचकारतीं, तरह-तरह से लाड़-प्यार करतीं और जब कभी नटखट श्रीकृष्ण उन्हें तंग करते तो वह उन्हें सजा भी देती थीं। एक बार तो उन्होंने अपने बाल-गोपाल को ओखल से बांध दिया था। अनुपम वात्सल्य की देवी यशोदा जी जब भी अपनी गोद में बैठे बालरूप भगवान श्रीहरि को स्तनपान करते हुए देखतीं तो मातृत्व-प्रेम में सराबोर हो उन्हें ‘ऐ मेरे गोविन्द... ऐ मेरे दामोदर... ऐ मेरे माधव... आदि नामों से पुकारने लगती थीं।’
माता यशोदा की जन्म कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पिछले जन्म में माता यशोदा ‘धरा’ और नंद बाबा ‘वसुश्रेष्ठ द्रोण’ थे। दंपति द्वारा घोर तपस्या करने के उपरांत जब पद्मयोनि ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए, तब वसुश्रेष्ठ द्रोण ने सपत्नीक उनसे प्रार्थना की कि हे देव! पृथ्वी पर जन्म लेने पर भगवान श्रीकृष्ण में हमारी अविचल भक्ति हो, जिसके उपरांत ब्रह्मा जी ने उनकी विनती स्वीकार करते हुए ‘तथास्तु’ कहा था। इस प्रकार, ब्रह्मा जी के वरदान से ब्रजमंडल में सुमुख नामक गोप की पत्नी पाटला के गर्भ से देवी यशोदा का जन्म हुआ। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार माता यशोदा के माता-पिता ने उनका विवाह ब्रज के राजा नंद बाबा से कर दिया, जिनके पुत्र रूप में बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार पूर्व जन्म में माता यशोदा ने भगवान श्रीहरि विष्णु को पुत्र रूप में प्राप्त करने हेतु घोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उनसे कहा- ‘मैं वासुदेव और माता देवकी के घर जन्म लूंगा, लेकिन मातृत्व का सुख आपको ही प्राप्त होगा।’ कालांतर में ऐसा ही हुआ। पौराणिक ग्रंथों में माता यशोदा को नंद बाबा की पत्नी और ‘नन्दरानी’ बताया गया है। भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के राजा कंस की बहन देवकी के गर्भ से अर्द्धरात्रि में हुआ था, जब देवकी अपने पति वासुदेव सहित कंस के कारागार में बंद थीं। कंस के अत्यंत क्रूर पंजों से रक्षा हेतु वासुदेव रात्रि में ही अपने पुत्र श्रीकृष्ण को ब्रज के अपने अनन्य मित्र, संबंधी एवं राजा नंद और माता यशोदा के घर गोकुल में छोड़ आये। तत्पश्चात उनका पालन-पोषण माता यशोदा ने किया।
श्रीकृष्ण की नित्य माता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान की नित्य लीला यानी वैकुण्ठ धाम में भी एक ‘यशोदा’ हैं। वे भगवान श्रीकृष्ण की नित्य माता हैं, जो उनको सदा वात्सल्य रस का आस्वादन कराती हैं। बता दें कि जब ब्रजमंडल में भगवान के अवतरण का समय हुआ, तब इन चिदानन्दमयी, वात्सल्यरसमयी ‘नित्ययशोदा’ का भी ‘नन्दरानी’ यशोदा में ही आवेश हो गया। इस प्रकार, पाटलापुत्री यशोदा नित्ययशोदा से मिलकर एकमेक हो गयीं, जिनके पुत्र रूप में आनंदकन्द परब्रह्म पुरुषोत्तम स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र अवतीर्ण हुए।
श्रेय और यश प्रदाता
यशः और दा के मेल से बने शब्द ‘यशोदा’ का अर्थ दूसरों को यश एवं श्रेय प्रदाता होता है, जैसा कि माता यशोदा ने जीवनभर किया था। सच कहा जाए तो ऐसे ही दिव्य गुणों को धारण करने वाली माताओं को भगवान पुत्र रूप में प्राप्त होते हैं। वात्सल्य की अनन्य उपासिका यशोदा जी के विलक्षण व्यक्तित्व की तुलना जगत की किसी दूसरी माता से नहीं की जा सकती। उनका हृदय त्याग, स्नेह, दया और करुणा से भरा हुआ था। बता दें कि सदा दूसरों को श्रेय और यश प्रदान करना एक प्रकार का त्याग होता है, जो साधना का एक महत्वपूर्ण चरण भी है। देखा जाए तो भगवान की परम भक्त माता यशोदा ने एक सच्ची साधिका के रूप में भी अपना नाम सार्थक किया। उन्होंने रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई बलराम के पालन-पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। वैसे, उनकी एक पुत्री भी थी, जिसका नाम एकांगा था। इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण की माता के रूप में यशोदा जी का चरित्र अनुपम और अविस्मरणीय है।
जयंती का महत्त्व
यशोदा जयंती के दिन माता यशोदा की गोद में विराजमान श्रीकृष्ण के बाल रूप और माता यशोदा की पूजा करने से संतान संबंधी सभी परेशानियां दूर होती हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, इस दिन यदि कोई स्त्री निश्छल मन से श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक माता यशोदा एवं भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा-आराधना करती है तो उसे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप के दर्शन भी होते हैं।

