पर्यूषण पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, अपरिग्रह, अहिंसा और आत्मावलोकन की साधना है। यह पर्व भोग नहीं, त्याग; संग्रह नहीं, आत्मपरिष्कार तथा क्षमा, करुणा और आत्मजागरण का संदेश देता है।
त्योहारों की हमारी कल्पना में रंग हैं, रोशनी है, पकवान हैं, खरीदारी है और समग्रता में उत्सव है। कहने का मतलब यह है कि त्योहार का अर्थ आनंद और उल्लास है। लेकिन एक ऐसा पर्व भी है, जिसकी असली चमक बाहर नहीं, बल्कि भीतर दिखाई देती है। जहां उत्सव का अर्थ खाना नहीं, त्यागना होता है। जहां उत्सव का मतलब ज्यादा जुटाना नहीं, बल्कि बहुत कुछ छोड़ देना होता है। जहां स्वाद से अधिक महत्वपूर्ण संयम है और भोग से कहीं ज्यादा मूल्यवान त्याग। जी हां, हम पर्यूषण पर्व की बात कर रहे हैं, जो केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक विरल जीवन-दृष्टि है।
जैन परंपरा में पर्यूषण का पर्व 8 से 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस साल यह 8 सितंबर से शुरू हो रहा है। जैन धर्म की दो प्रमुख शाखाएं हैं—श्वेतांबर और दिगंबर। श्वेतांबर परंपरा में यह पर्व 8 दिनों का होता है और इसका अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है, जो बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन आत्मचिंतन, प्रतिक्रमण, प्रायश्चित और क्षमा-याचना की विशेष परंपरा है। संवत्सरी के अवसर पर जैन लोग एक-दूसरे से कहते हैं—‘मिच्छामि दुक्कडम्’, अर्थात मेरे द्वारा मन, वचन या कर्म से कोई अपराध अथवा दोष हुआ हो तो मैं क्षमा मांगता हूं।
जबकि जैन धर्म की दूसरी शाखा दिगंबर परंपरा में यह पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस कालखंड को दशलक्षण पर्व कहा जाता है। प्रत्येक दिन धर्म की एक साधना पर केंद्रित होता है। ये दस साधनाएं हैं—उत्तम क्षमा (क्षमा), उत्तम मार्दव (विनम्रता), उत्तम आर्जव (सरलता), उत्तम शौच (लोभ से मुक्ति/आंतरिक पवित्रता), उत्तम सत्य (सत्य), उत्तम संयम (इंद्रिय एवं जीव-संयम), उत्तम तप (तपस्या), उत्तम त्याग (त्याग), उत्तम आकिंचन्य (ममत्व और परिग्रह का त्याग) और उत्तम ब्रह्मचर्य (आत्मसंयम)।
जैन परंपरा में पर्यूषण आत्मशुद्धि, संयम, तप और आत्मावलोकन का पर्व है। यह पर्व कुछ समय के लिए बाहरी संसार की भागदौड़ से हटाकर अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। जैन दर्शन का मूल आग्रह है कि मनुष्य अपने कषायों—क्रोध, मान, माया और लोभ—पर विजय पाने की कोशिश करे। इसलिए पर्यूषण पर्व केवल कैलेंडर पर आने वाला 8 या 10 दिनों का कोई धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह स्वयं के साथ संवाद करने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
आज के उपभोक्तावादी समय में भला कौन ऐसा पर्व है, जो कहता है—यह खाने का नहीं, छोड़ने का उल्लास है? ऐसा सिर्फ जैन धर्म का पर्यूषण पर्व ही कहता है। इसलिए आज के इस उपभोक्तावादी दौर में इसकी बहुत ज्यादा प्रासंगिकता है। आज इंसान अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा ‘और’ के पीछे भागकर बिता देता है। और पैसा, और सामान, और सुविधाएं, और स्वाद, और मनोरंजन। मतलब यह कि जरूरतें हैं कि पूरी होने का नाम ही नहीं लेतीं।
नया मोबाइल पुराने से बेहतर लगता है। अलमारी भले कपड़ों से भरी हो, पर कुछ नए कपड़े चाहिए और घर में चाहे सामान रखने की जरा भी जगह न हो, फिर भी खरीदारी जारी रहती है। जैन दर्शन इस अंतहीन दौड़ के सामने एक मौलिक सवाल उठाता है—हमारे पास वस्तुएं ज्यादा हैं या इच्छाएं?
यहीं से आता है अपरिग्रह। अपरिग्रह का अर्थ केवल वस्तुओं का त्याग कर देना नहीं है। इसका अर्थ है वस्तुओं और संग्रह के प्रति आसक्ति को कम करना। आवश्यकता और लालसा के बीच अंतर समझना। जितना जरूरी है, उतना रखना और बाकी के प्रति मोह कम करना। आधुनिक भाषा में इसे मिनिमलिज्म कहते हैं। लेकिन जैन दर्शन में यह केवल जीवनशैली नहीं, आत्मशुद्धि का साधन है। पर्यूषण इस अपरिग्रह को जीवन में उतारने का मौका देता है।
इस पर्व में तप का विशेष महत्व है। उपवास और अन्य व्रत केवल शरीर को भोजन से दूर रखने की क्रिया नहीं हैं, इनका उद्देश्य इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मसंयम की साधना भी है। जब मनुष्य अपनी इच्छा के सामने ‘नहीं’ कहना सीख जाता है, तब वह केवल भोजन पर नियंत्रण नहीं करता, बल्कि अपनी आदतों और वासनाओं पर नियंत्रण की क्षमता विकसित करता है। यही कारण है कि जैन धर्म में संयम को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
पर्यूषण की साधना इसलिए ‘कम’ को महत्व देती है, क्योंकि इस ‘कम’ का रिश्ता केवल भोजन से नहीं है। कम क्रोध, कम लोभ, कम अहंकार, कम संग्रह, कम हिंसा, कम आसक्ति और इसके बदले अधिक क्षमा, करुणा, मैत्री और आत्म-जागरूकता। जैन दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत अहिंसा है। सामान्य अर्थ में हम इसे किसी जीव को शारीरिक रूप से क्षति न पहुंचाने से समझते हैं। लेकिन जैन दृष्टि में अहिंसा का अर्थ इससे कहीं व्यापक है। हमारे विचार, वाणी और व्यवहार भी किसी को चोट पहुंचा सकते हैं। इसलिए संयमित जीवन केवल अपने ऊपर नियंत्रण नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति संवेदनशीलता भी है। पर्यूषण इसी संवेदनशीलता को गहरा करता है।
इस पर्व का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम प्रतिक्रमण है। अपने द्वारा की गई भूलों और दोषों की ओर लौटकर उनका आत्मावलोकन करना। दिन-प्रतिदिन की जिंदगी में हम दूसरों की गलतियां आसानी से देख लेते हैं, मगर अपनी नहीं देख पाते। प्रतिक्रमण हमें अपने भीतर देखने की आदत सिखाता है। इसलिए समग्रता में पर्यूषण का चरम केवल उपवास नहीं, बल्कि अंतःआत्मा की सफाई है।

