यमुनोत्री धाम, उत्तराखंड की चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है, जो भक्ति, शांति और मोक्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। समुद्रतल से दस हजार फीट ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र स्थल यमुनाजी के मंदिर और उनके उद्गम स्थल के रूप में श्रद्धालुओं को आस्था और आत्मिक शुद्धि का अनुभव कराता है।
अनादिकाल से मोक्ष और वानप्रस्थ का मार्ग मानी जाने वाली चार धाम यात्रा आज अपने नए स्वरूप में है। कभी जीवन के अंतिम पड़ाव की तीर्थ यात्रा अब आयु की सीमाओं को तोड़ चुकी है। दुर्गम रास्तों से सुगम सुविधाओं तक के इस सफर में, अब हर पीढ़ी की आस्था देवभूमि के इन चार पवित्र धामों में एक साथ उमड़ रही है।
उत्तराखंड स्थित चार प्रसिद्ध धामों में यमुनोत्री पहला धाम है। चार धाम दर्शन की शुरुआत यहां से होती है। यहां वामावर्त यात्रा का माहात्म्य है। यमुनाजी के दर्शन से भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। शास्त्रों में मां यमुना को भक्ति और मुक्ति प्रदायिनी कहा गया है। गंगाजी के दर्शन से ज्ञान मार्ग, केदारनाथ दर्शन से वैराग्य और बदरीनाथ धाम में नारायण के दर्शन से मानव को सांसारिक मोह माया से मुक्ति मिलकर मोक्ष मिलता है।
हिमालय में प्रवाहित होने वाली नदियों का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। ये महज नदी नहीं, बल्कि करोडों श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का केन्द्र हैं। सदा नीरा नदियां हमारी सभ्यता और संस्कृति की आधार हैं। हिमालय के शिखरों से प्रभावित होने वाली इन नदियों का उल्लेख पुराणों से लेकर आधुनिक साहित्य में विस्तार से किया गया है।
तीर्थ यात्रा का पहला पड़ाव
हिमालय के पश्चिम में स्थित यमुनोत्री धाम, चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यह उत्तरकाशी जिले की बडकोट तहसील में स्थित है। समुद्र तल से दस हजार फीट की ऊंचाई पर यमुनाजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां दर्शन और पूजन कर मनुष्य मोक्ष की कामना करता है। यमुनाजी का बाहन कछुआ है। जो संयम का प्रतीक माना जाता है।
प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में इस धाम का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसको पतितपावनी माना जाता है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य, इंद्रियों पर संयम और पवित्रता के साथ कल्याण मार्ग पर प्रशस्त होकर परमात्मा में विलीन होना है।
बंदरपुंछ पर्वत उद्गम स्थल
बंदरपुंछ पर्वत के एक भाग को कलिन्द कहते है। मां यमुना का उद्गम स्थल होने के कारण इसका नाम कालिन्दी पड़ा। यमुनोत्री का मंदिर यमुना नदी के बायें तट पर कालिन्द पर्वत की तलहटी में स्थित है।
यह वह स्थान है, जहां यमुना पृथ्वी को स्पर्श करती है। दरअसल यमुना का उद्गम स्थान बर्फ से जमी एक झील तथा कालिन्द ग्लेशियर है। जो यमुनोत्री से कुछ किमी ऊपर की ओर समुद्र तल से चार हजार मीटर की ऊंचाई पर है। यमुनाजी को दो रूपों, प्राकृतिक नदी और मंदिर में विग्रह के रूप में पूजा जाता है।
ऋषि-मुनियों की तपस्थली
हिन्दू धर्म ग्रन्थों एवं पुराणों में यमुनोत्री का विशेष स्थान है। यह स्थान ऋषि मुनियों की तप स्थली है। यमुनाजी, यमराज की बहन, भगवान सूर्य की पुत्री और भगवान कृष्ण की रानियों में एक हैं। इन्हें कालिन्दी भी कहा जाता है। यहां पर यमुनाजी ने तपस्या की । उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिया।
जनश्रुति के अनुसार महर्षि असित ने इस स्थान की खोज कर यहां पर अपना आश्रम बनाया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इस स्थान में रहकर तप में लीन रह कर व्यतीत किया।
धाम का माहात्म्य
स्कंद पुराण के अनुसार यहां पर यमुना के अवतार से पूर्व अग्नि ने कठोर तपस्या की। तपस्या के फलस्वरूप अग्नि को दिक्पाल पद मिला। यहीं पर सप्त कुण्ड नामक सरोवर अग्नि के प्रतीक रूप में प्रकट हुआ। इस सरोवर को गोरख डिविया कहते हैं। यहां सिद्ध नामक तीर्थ है। जहां यमराज ने तप किया और लोकपाल का पद पाया।
कूर्म पुराण की ब्राही संहिता में यमुना का उल्लेख है। सूर्य पुत्री यमुना तीनों लोकों में विख्यात है। यमुनाजी में स्नान करने से पापों से मुक्ति और पान करने से सात कुलों का उद्धार होता है।
अक्षय तृतीया को खुलेंगे कपाट
वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इसे आखा तीज भी कहते हैं। यह दिन मांगलिक कार्यों के लिए शुभ माना गया है। इस दिन उत्तराखंड के चार धामों में दो धाम यमुनोत्री और गंगोत्री मंदिर के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए खोले जाते हैं।

