होली प्राचीन एवं वैज्ञानिक पर्व है। अन्य त्योहारों की तरह प्रकृति से भी संबंधित है। इससे भक्त प्रह्लाद व होलिका की कथा जुड़ी है। वहीं भगवान कृष्ण सनातन सिद्धांतों के अनुरूप पर्व आयोजन की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में स्नेह व श्रद्धाभाव से होली मनाने का संकल्प लें।
होली का नाम सुनते ही लोगों के चेहरों पर ओज चमकने लगता है। यह खुशी, उमंग तथा उत्साहवर्धन करने वाला पर्व है। ठंड के मौसम से सिकुड़ा हुआ शरीर होली की गर्माहट से स्फूर्ति का अनुभव करने लगता है। ऐसे में महिलाएं, पुरुष तथा बच्चे एक-दूसरे के चेहरों को रंग देते हैं। सरसों की पीले रंग की फसल देख लोग झूम उठते हैं। वहीं गेहूं की बालियांे पर सुनहरी तथा चने के होलों पर चढ़े हरे रंग से मन हर्षाता है।
होली का यह अनूठा त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा आसपास के प्रांतों में इसे होली, होलिका, फाग, धुलेंडी तथा फगुआ के नाम से पुकारते हैं। मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र में जहां इसे रंग पंचमी व फाल्गुन पूर्णिमा कहते हैं, वहीं पश्चिम बंगाल, असम आदि प्रदेशों में डोल पूर्णिमा, डोल जात्रा या डोल महोत्सव के रूप मनाते हैं। दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में इसे ‘कामदहनम्’ के नाम से जानते हैं। परन्तु ब्रज की लठमार होली जग प्रसिद्ध है, जहां श्रीकृष्ण रूप के साथ बरसाने की गोपियां होली खेलती हैं।
भगवान श्रीकृष्ण की होली
यह त्योहार सभ्यता के आरम्भ से मनाया जाता रहा है। पौराणिक साहित्य के अनुसार श्रीकृष्ण गोपियों संग होली खेलते, उन्हें रंग लगाते थे। परन्तु श्रीकृष्ण उच्छृंखल नहीं बल्कि सभ्य थे। सनातन वैदिक धर्म के अनुसार प्राचीन चार त्योहार सभी चारों वर्णों द्वारा मनाए जाते रहे हैं। इनमें श्रावणी पर्व (ब्राह्मण), आश्विन पर्व (क्षत्रिय), कार्तिक पर्व (वैश्य) तथा फाल्गुनी पर्व (शुद्र अर्थात् अशिक्षित) वर्ण को समर्पित रहे हैं। आज की कथित जातियों से इनका कोई संबंध नहीं। मनुस्मृति में कहा है कि शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम्, वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शुद्रस्य प्रेष्यसंयुक्तम्।
श्रावणी पर्व : यह शिक्षकों से जुड़ा पर्व है। इस दिन बालकों को गुरुकुल में प्रवेश करवाया जाता था। आजकल इसे रक्षाबंधन के नाम से जानते हैं।
आश्विन पर्व : इस पर्व का संबंध देश के रक्षकों से है। वर्षा ऋतु के उपरान्त क्षत्रिय अर्थात् सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्रों का नवीनीकरण करते हैं। इस पर्व को बाद में शौर्य के प्रतीक भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से जोड़ दिया जिसे दशहरा कहा जाता हैं।
कार्तिक पर्व : यह पर्व किसानों, व्यापारियों तथा कर्मकारों के लिए है। इसलिए इसे वैश्य पर्व कहा है। कार्तिक की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस पर्व को दिवाली कहते है।
फाल्गुनी पर्व : फाल्गुनी अर्थात होली का पर्व शूद्र यानी अशिक्षित वर्ग को समर्पित है। खेल-खेल में जीवन को रंगीन करना ही इसका उद्देश्य रहा है।
भगवान श्रीकृष्ण एक चारों वर्णों की व्यवस्था के देव पुरुष थे। जब गीता का उपदेश देते हैं तो ब्राह्मण, सुदर्शन चक्र धारण करते हैं तो क्षत्रिय, गोपालक के रूप में वैश्य तथा राजसूय यज्ञ में पग धोते समय शूद्र का कार्य करते हैं। वे सभी वर्णों को संयम और समभाव से होली खेलने का संदेश देते हैं।
रंग पर्व का वैज्ञानिक महत्व
इस पर्व को भक्त प्रह्लाद, उनकी बुआ होलिका तथा पिता हिरण्यकशिपु से भी जोड़ कर देखा जाता है। परन्तु भारतीय संस्कृति में सभी त्योहारों को प्रकृति के साथ जोड़ा गया है। होली के रंगों का शरीर, मन और बुद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। सरसों, पलाश, अमलताश, नीम, हल्दी इत्यादि से प्राकृतिक रंग तैयार किये जाते हैं। ये रंग, त्वचा के छिद्रों का शोधन कर संक्रामक रोगों से बचाते हैं। रंगों से खेलने, नृत्य तथा संगीत से मनुष्य में सकारात्मक तरंगें फैलती हैं। आजकल ऋतु परिवर्तन के दौरान हानिकारक जीवाणु अधिक हो जाते हैं। इसलिए गोबर के उपलों, आम की लकडि़यों, देसी घी तथा सूखे मेवों का प्रयोग होली दहन में होता है। इससे बैक्टीरिया नष्ट होकर पर्यावरण शुद्ध होता है।
हरियाणा की होली-दुलंडी
हरियाणा में होली बड़ी धूमधाम से मनायी जाती है। वसंत पंचमी पर होली मनाने का स्थान निर्धारित करते हुए ‘डांडा’ यानी डंडा गाड़ देते हैं। होलिका दहन पर गोबर के उपले व अन्य सामग्री अर्पित की जाती है। होली की ज्वाला में गेहूं और चने के भुट्टों को भून कर खाया जाता है, जिन्हें ‘होलक’ या होला कहते हैं। बच्चों के लिए बेर तथा मेवों की कंडी बनाई जाती है। होली के बाद फाग बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन सभी आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को गुलाल और रंग लगाते हैं।
‘कामदहनम्’ रूप
दक्षिण भारत में होलिका दहन को ‘कामदहनम्’ नाम से पुकारा जाता हैं। मान्यता है कि इस दिन देवताओं द्वारा समाधिस्थ भगवान शिव के मन में कामवासना जागृत करने का प्रयास किया गया। इससे क्रोधित भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया। इसे जीवन की उत्कृष्टता हेतु काम पर विजय प्राप्त करना ही समझना चाहिए। यह समय ऋतु और वर्ष परिवर्तन का होता है। अतः इस दौरान शरीर को बलिष्ठ और त्रिदोषों को सम रखना चाहिए।
होलिका एक प्राचीन एवं वैज्ञानिक पर्व है। भगवान श्रीकृष्ण सनातन सिद्धांतों के अनुरूप पर्वों के आयोजन की प्रेरणा देते हैं। अतः हमें स्नेह व श्रद्धाभाव से होली मनाने का संकल्प लेना चाहिए।

