एक बार पाब्लो नेरूदा इटली भ्रमण के दौरान काफी खुशी से सभी के प्रति अपनापन अभिव्यक्त करने लगे। कवि हृदय होने के कारण वे अपनी प्रशंसक सुंदर महिलाओं की भी तारीफ करने लगे। एक संकीर्ण सोच वाले व्यक्ति ने उन पर फब्ती कसी, मगर नेरूदा को बुरा नहीं लगा। वे बोले, ‘मैं कवि हूं और मुझे हर मनभावन चीज से प्यार है।’ जहां तक खूबसूरती की बात है, सौंदर्य तो बहुआयामी है। यह महज दृश्य तक सीमित नहीं है। श्रवण का भी अपना सौंदर्य है, स्वाद का भी अपना सौंदर्य है। सौंदर्य का संबंध बुद्धि से नहीं, बल्कि भाव से है; मस्तिष्क से नहीं, बल्कि हृदय से है। सौंदर्य को रूप-रंग और आकार के तराजू से तौला नहीं जा सकता। रूप-रंग से तय किया गया सौंदर्य क्षणिक है, जबकि वास्तविक सौंदर्य शाश्वत है। सौंदर्य वासनातीत है। सौंदर्य किसी की कमजोरी नहीं हो सकता। सौंदर्य कामुकता को जन्म नहीं देता, बल्कि कुदरत के प्रति सम्मान का भाव गहरा करता है।
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