कोलकाता का कालीघाट मंदिर जीवन के कोलाहल के बीच स्थित उग्र शक्ति का स्थल है, जहां भय नहीं, बल्कि सत्य, आत्मबोध और स्वीकार की अनुभूति होती है।
कालीघाट मंदिर तक पहुंचना किसी पहाड़ी चढ़ाई या वन-यात्रा जैसा कठिन या रोमांचक नहीं है। यह मंदिर कोलकाता शहर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है—कहना चाहिए, बिल्कुल शहर के दिल में। यहां भीड़, शोर, दुकानों, फूलों, पंडों और तमाम तरह की आवाज़ों के बीच से होकर मंदिर तक पहुंचना होता है। कोलकाता के कालीघाट मंदिर की यही पहचान है। मां काली कोई एकांत की देवी नहीं हैं। वे जीवन के कोलाहल के बीच मौजूद शक्ति हैं। यहां पहुंचने के बाद ही पता चलता है कि काली का उग्र रूप भय या डराने के लिए नहीं, बल्कि सत्य उजागर करने के लिए है—वह सत्य जो अक्सर सभ्यताओं को असहज करता है।
पहली नज़र का विस्मय
कालीघाट मंदिर में प्रवेश करते ही जो पहली अनुभूति होती है, वह विस्मय है, और कुछ पलों बाद यह विस्मय गहरी आस्था में बदलता प्रतीत होता है। तंग गलियां, आवाज़ों का शोर, फूल-माला, प्रसाद, पंडों की लगभग चीखती आवाज़ें—लगता है सब कुछ एक साथ आप पर टूट पड़ा है। लेकिन जैसे ही आप गर्भगृह के पास पहुंचते हैं, यह अराजकता अचानक एक आध्यात्मिक खोज में बदल जाती है। यहां कोई लंबा ध्यान या विलंबित संगीत का माहौल नहीं होता, फिर भी जैसे ही आप सीधे देवी मां की आंखों में देखते हैं, उनकी बड़ी-बड़ी आंखें सीधे आपसे मुखातिब लगती हैं। यह प्रभाव इतना आकस्मिक होता है कि तैयार होने का कोई अवसर नहीं मिलता। काली मां का साक्षात्कार होते ही अर्धनिद्रा-सी मदहोशी छा जाती है। यह इस प्राचीन मंदिर का सबसे प्रभावी मनोविज्ञान है।
शक्तिपीठ की कथा
पुराणों के अनुसार कालीघाट मंदिर वहीं स्थित है, जहां सती के दाएं पैर की चार अंगुलियां गिरी थीं। इसी कारण यहां देवी की पूर्ण मूर्ति नहीं, बल्कि पवित्र पदचिह्न की पूजा होती है। यह तथ्य सामान्यतः ध्यान में नहीं आता, पर अपने-आप में गहरे आध्यात्मिक बोध से भर देता है। वास्तव में यह मंदिर पूर्णता का नहीं, बल्कि अवशेष की शक्ति का प्रतीक है। मंदिर में प्रवेश के कुछ ही समय बाद इसका प्रभाव मन पर छा जाता है। जहां अधिकांश मंदिर अपनी सम्पूर्णता में दिखते हैं, वहीं कालीघाट की चुंबकीय शक्ति इसके अधूरेपन में ही निहित है। यहां अपूर्णता शक्ति के स्वीकार के रूप में प्रकट होती है।
भय नहीं, न्याय की देवी
काली की मूर्ति पहली नज़र में भयावह लग सकती है—काली देह, बाहर निकली जीभ, मुंडमाला और उग्र आंखें। लेकिन ध्यान से देखने पर यह मूर्ति करुणा से भरी प्रतीत होती है। देवी की जीभ बाहर इसलिए है कि अहंकारवश उन्होंने भगवान शिव को अपने चरणों तले दबा लिया था और जैसे ही उन्हें इसका बोध होता है, लज्जा और आत्मग्लानि में उनकी जीभ बाहर आ जाती है। यह दृश्य सिखाता है कि सबसे उग्र शक्ति भी आत्मबोध के सामने नतमस्तक होती है। कालीघाट भारत के उन गिने-चुने मंदिरों में है, जहां आज भी पशु-बलि की परंपरा जीवित है। भले ही यह आधुनिक समाज के लिए असहज प्रश्न हो, पर कालीघाट इसका कोई सरल उत्तर नहीं देता। यहां बलि उत्सव नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है। हालांकि अब यह बलि प्रतीकात्मक रूप में होती है।
परमहंस से रिश्ता
कालीघाट का उल्लेख होते ही रामकृष्ण परमहंस की स्मृति ताज़ा हो जाती है। सच तो यह है कि कालीघाट को रामकृष्ण परमहंस के बिना समझना अधूरा है। यहीं उन्होंने देवी को मां के रूप में देखा—डरावनी नहीं, बल्कि वात्सल्य से भरी मां। उनके लिए काली कोई मूर्ति नहीं थीं, बल्कि जीवित चेतना थीं, जो हंसती हैं, रूठती हैं और साधक से संवाद करती हैं। रामकृष्ण ने कालीघाट को तंत्र की भयावह छवि से निकालकर भक्ति और प्रेम का केंद्र बना दिया। कालीघाट में धर्म और अर्थशास्त्र साथ-साथ चलते हैं। यहां पंडा-प्रथा, दान-दक्षिणा और ‘शीघ्र दर्शन’ जैसी व्यवस्थाएं दिखती हैं, जो कई श्रद्धालुओं को असहज करती हैं। लेकिन यही कालीघाट का यथार्थ है। यह मंदिर आदर्श नहीं, जीवन का प्रतिबिंब है। यहां आस्था, लालच, करुणा और स्वार्थ एक साथ मौजूद हैं। काली यहां सबको स्वीकार करती हैं—शायद इसलिए क्योंकि वे किसी को प्रमाणपत्र नहीं देतीं।
रहस्यमयी गुफा
कालीघाट में स्त्री-शक्ति किसी रहस्यमयी गुफा में छिपी नहीं है, बल्कि सड़क पर है, भीड़ में है, शोर में है। यह मंदिर बताता है कि स्त्री-शक्ति को कोमल बनाकर पूजना आसान है, लेकिन उसे उग्र रूप में स्वीकार करना साहस मांगता है। कालीघाट उसी साहस की परीक्षा लेता है। यहां दर्शन क्षणभर का होता है—किसी को लंबे ठहराव की अनुमति नहीं—लेकिन वही क्षण आत्मबोध के लिए पर्याप्त होता है। काली की आंखें स्थिर नहीं हैं; वे जैसे हर व्यक्ति को अलग-अलग देखती हैं। कोई रो पड़ता है, कोई घबरा जाता है, कोई नतमस्तक हो जाता है। यह अनुभव व्यक्तिगत है और शायद इसी कारण अविस्मरणीय भी।
आज का कालीघाट मंदिर केवल रोमांच का केंद्र नहीं, बल्कि एक पर्यटन स्थल और राजनीतिक उपस्थिति का केंद्र भी बन चुका है। हालांकि अब सुधार हो रहे हैं, व्यवस्थाएं बेहतर हो रही हैं, लेकिन मंदिर की आत्मा से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। उसकी मूल आत्मा आज भी वही है—कच्ची, तीखी और असुविधाजनक। यह मंदिर आधुनिक सजावटी अध्यात्म को नकारता है।
शक्ति का साक्षात्कार
कालीघाट शक्ति का स्थल है और यह सिखाता है कि शक्ति का सुंदर होना आवश्यक नहीं। आस्था का हमेशा आरामदेह होना भी जरूरी नहीं, और देवी का मुस्कुराता होना तो बिल्कुल भी अनिवार्य नहीं। शायद कालीघाट कहता है— ‘मुझे समझने से पहले अपने डर से मिलो।’ सचमुच, कामाख्या मंदिर के बाद जब कालीघाट की यात्रा होती है, तो यह हमें एक बिल्कुल अलग संसार में ले जाती है—जहां स्त्री-देह का उत्सव नहीं, बल्कि शक्ति का साक्षात्कार है। इ.रि.सें.

