एकदा

जीवनदान

जीवनदान

महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था। पितामह भीष्म के तीरों का निशाना पांडवों की ओर नहीं था। इससे क्रोधित होकर दुर्योधन ने एक भी पांडव का वध नहीं होने से पितामह पर व्यंग्य कस दिया। इससे आहत होकर पितामह भीष्म ने घोषणा कर दी कि मैं कल पांडवों का वध कर दूंगा। पांडवों के शिविर में भय और बेचैनी बढ़ गई। श्रीकृष्ण भीष्म की सैन्य क्षमताओं से बखूबी वाकिफ थे, इसलिए उन्होंने द्रौपदी से कहा, ‘अभी मेरे साथ चलो, और श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर भीष्म पितामह के शिविर में गए। श्रीकृष्ण शिविर के बाहर खड़े हो गए और द्रौपदी से कहा, ‘अंदर जाकर पितामह को प्रणाम करो।’ पांचाली ने श्रीकृष्ण के कहे अनुसार भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने द्रौपदी को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान दिया और पांचाली से पूछा, ‘पुत्री इतनी रात को तुम यहां पर कैसे आई, क्या तुमको श्रीकृष्ण यहां पर लेकर आए हैं?’ तब पांचाली ने इसका उत्तर हां में देते हुए कहा कि श्रीकृष्ण बाहर खड़े हैं। यह सुनते ही भीष्म श्रीकृष्ण के पास गए और दोनों ने एक-दूसरे को प्रणाम किया। भीष्म ने कहा, ‘मेरे एक वचन को दूसरे वचन से काटने का काम केवल देवकीनंदन ही कर सकते हैं।’ शिविर में वापस आकर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया। प्रस्तुति : सुष्मिता शर्मा

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