भादो की रिमझिम, झूलों की मस्ती और सखियों के सामूहिक गीतों से कजरी तीज का रंग गहरा हो उठता है। यह सिर्फ व्रत-पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, विरह, लोकपरंपरा, स्त्री स्मृतियों और मानसून संस्कृति से जुड़ा जीवंत उत्सव है, जिसकी अपनी अलग लोकछटा है।
हरियाली तीज के लगभग 15 दिनों बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी तीज का व्रत रखा जाता है। हिंदू धर्म में तीन प्रमुख तीजें—हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज—होती हैं। कजरी तीज का संबंध भी हरियाली तीज की तरह भगवान शिव और माता पार्वती से है। विवाहित महिलाएं परिवार की सुख, समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित महिलाएं दांपत्य सुख की कामना से यह व्रत करती हैं। इस पर्व के पीछे मूल भाव निष्ठा, प्रेम, दांपत्य और पारिवारिक मंगल का है। इस साल कजरी तीज 31 अगस्त, दिन सोमवार को मनाई जाएगी।
कजरी तीज के कई अलग-अलग नाम हैं। कुछ जगहों में इसे कजली तीज, कुछ में कजरी तीज, कई जगह बड़ी तीज और कुछ क्षेत्रों में इसे सातुड़ी तीज भी कहते हैं। यह वर्षा ऋतु में आने वाला उत्तर भारत की महिलाओं का प्रमुख पर्व है। हिंदू धर्म में तीन तीजें धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशेष महत्व की होती हैं। उनमें हरियाली के बाद यह कजरी दूसरी बड़ी तीज है और तीसरी तीज हरतालिका होती है। अगर सावन की हरियाली और शिव-पार्वती के प्रेम उत्सव का बखान करने के लिए हरियाली तीज यानी पहली बड़ी तीज को गिना जाता है, तो कजरी तीज को भादो की बारिश, विरह, लोकगीत और स्त्री स्मृतियों के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में जहां इसे 24 घंटे के व्रत और विभिन्न तरह की लोक परंपराओं के साथ मनाया जाता है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस पर्व को विशेषकर कजरी लोकगायन के रूप में मनाया जाता है। जहां तक राजस्थान का सवाल है, तो वहां इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और विशेषकर नीमड़ी माता की पूजा करती हैं। नीमड़ी माता की पूजा में महिलाएं श्रीकृष्ण के लिए राधा की लालसा के बारे में कजरी लोकगीत गाती हैं और नीम के पेड़ों में झूलों पर झूलती हैं। इस दिन यहां नीमड़ी माता की पूजा की जाती है।
नीमड़ी माता लोक आस्था में पूजी जाने वाली देवी हैं। कुछ लोग नीमड़ी माता का संबंध नीम के पेड़ से लगाते हैं, तो कुछ लोगों के मुताबिक नीमड़ी माता वास्तव में मां पार्वती ही हैं। लेकिन राजस्थान के जिन इलाकों में विशेष तौर पर नीमड़ी माता की पूजा होती है, वहां इसे लोक विश्वास में नीम की शुद्धता, आरोग्यता, सुरक्षा और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के प्रतीक के रूप में नीम को ही नीमड़ी माता कहा जाता है। यह वास्तव में वृक्ष पूजा और देवी उपासना का सुंदर रूप भी है। इस दिन राजस्थान में जहां विशेषकर नीमड़ी माता के व्रत की परंपरा है, महिलाएं मिट्टी या गोबर से नीमड़ी माता की आकृति बनाती हैं, फिर उन्हें जल, रोली, चावल, मेहंदी, वस्त्र और शृंगार सामग्री आदि अर्पित करती हैं। नीमड़ी माता की पूजा भी पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य, संतान और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए ही मनाई जाती है।
मध्य प्रदेश और बिहार में कजरी व्रत-पूजा भी यहां की स्थानीय लोक-रीतियों के मुताबिक होती है और बिहार में विशेषकर भोजपुरी, मगही इलाकों में सांस्कृतिक रूप में इस दिन स्थानीय भाषा के कजरी लोकगीत गाए जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में इसका सांस्कृतिक पक्ष बेहद सघन और दिलचस्प होता है। बारिश की बूंदें, पेड़ की डाल पर पड़ा झूला, सखियों का समूह स्वर और कजरी के सामूहिक गीत—वास्तव में कजरी तीज का सबसे खुश करने वाला पक्ष यही है।
राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में नीमड़ी माता की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएं बाकी तीजों की तरह ही खूब बनाव-शृंगार करती हैं और हाथों व पैरों में मेहंदी लगाती हैं। जहां नीमड़ी माता की पूजा होती है, वहां महिलाएं नीमड़ी माता की मूर्ति गाय के गोबर या गेरू मिली मिट्टी से बनाती हैं। इस दिन जहां भी यह पर्व मनाया जाता है, अपने इलाके के हिसाब से पारंपरिक पकवान पकाए जाते हैं, ताकि इस दिन रिश्तेदारों को भी बुलाने और उपहार लेने-देने की भी परंपरा है। कई समुदायों में यह व्रत चांद के दर्शन के बाद पूजा करके खोल लिया जाता है, तो ज्यादातर जगहों पर यह अगले दिन सुबह सूरज निकलने के बाद व्रत खोला जाता है। इ. रि.सें.

