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सत्य की कसौटी

शिवरात्रि की रात महर्षि दयानंद सरस्वती मंदिर में जागरण कर रहे थे। आधी रात के बाद उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग के सामने लोग श्रद्धा से नतमस्तक थे, उसके पास रखा प्रसाद एक चूहा खा रहा है। यह दृश्य उनके...

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शिवरात्रि की रात महर्षि दयानंद सरस्वती मंदिर में जागरण कर रहे थे। आधी रात के बाद उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग के सामने लोग श्रद्धा से नतमस्तक थे, उसके पास रखा प्रसाद एक चूहा खा रहा है। यह दृश्य उनके मन में गहरा प्रश्न बन गया-यदि यह वास्तव में सर्वशक्तिमान है, तो स्वयं को एक छोटे जीव से क्यों नहीं बचा सकता? इस घटना ने उनके भीतर सत्य की तीव्र खोज जगा दी। उन्होंने घर और सुविधा छोड़ दी और वर्षों तक भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण किया। अनेक साधुओं और पंडितों से मिले, पर जहां अंधविश्वास या दिखावा मिला, वहां उन्होंने निडर होकर प्रश्न उठाए। वे केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करते थे; वे प्रमाण और तर्क की मांग करते थे। एक बार एक सभा में उनसे पूछा गया कि यदि वे परंपराओं पर प्रश्न उठाते हैं, तो समाज में अशांति नहीं फैलेगी? दयानंद ने उत्तर दिया कि अशांति प्रश्नों से नहीं, बल्कि असत्य से चिपके रहने से फैलती है। सत्य कभी समाज को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे शुद्ध करता है। उन्होंने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया, पर उसका अर्थ कर्मकांड नहीं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और एकेश्वरवाद था।

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