होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह प्रह्लाद की भक्ति और भगवान विष्णु की कृपा से जुड़ा है, जो यह दर्शाता है कि धर्म और सत्य अंततः अत्याचार और अहंकार पर विजय प्राप्त करते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा की शाम को प्रज्वलित होने वाली होलिका की अग्नि केवल लकड़ियों का ढेर नहीं जलाती, बल्कि वह मानव जीवन में अन्याय, अहंकार और अधर्म की प्रवृत्तियों को भी प्रतीकात्मक रूप से भस्म कर देती है। होलिका दहन भारतीय धार्मिक चेतना में इस अमर विश्वास का उत्सव है कि चाहे अत्याचार कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः विजय सत्य, धर्म और आस्था की ही होती है। होलिका दहन में यह विश्वास प्रमाण के तौर पर प्रह्लाद की सुरक्षा के रूप में साबित हुआ था।
प्रह्लाद हिरण्यकश्यप का बेटा था और होलिका उसकी बुआ थी। हिरण्यकश्यप को अहंकार था कि वह धरती में सबसे बलशाली और महान पराक्रमी राजा है, इसलिए प्रजा को उसकी पूजा करनी चाहिए, न कि देवताओं की। हिरण्यकश्यप की प्रजा डर से उसकी पूजा करती थी, लेकिन उसका बेटा प्रह्लाद इससे इंकार करता था और सच्चाई का सामना करता था। अपने बेटे की अपने खिलाफ बगावत से आहत होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को यह वरदान था कि उसे अग्नि जला नहीं सकती। इसलिए हिरण्यकश्यप जानता था कि आग से होलिका का कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन उसका बेटा, जो उसका विरोध करता है, जलकर खाक हो जाएगा।
लेकिन ईश्वर ने सच्चाई की लाज रखी। होलिका, जिसे आग में न जलने का वरदान था, वह जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। तभी से होली का पर्व भक्ति, श्रद्धा, आस्था और अहंकार पर विजय के रूप में मनाया जाता है। होली का सबसे प्रमुख धार्मिक आधार विष्णु पुराण और भागवत पुराण में वर्णित प्रह्लाद-होलिका कथा है, जिसमें बताया गया है कि कैसे अत्याचारी हिरण्यकश्यप ने धर्मशील बालक प्रह्लाद को मारने की कोशिश की और भगवान ने उसकी रक्षा की, क्योंकि प्रह्लाद विष्णु के परम भक्त थे। यह घटना इस सत्य को स्थापित करती है कि धर्म की शक्ति किसी भी दुष्ट की शक्ति से अधिक होती है।
होलिका दहन हमारे भीतर के सप्तदोषों, अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष का भी दहन है। होलिका दहन के अगले दिन रंगों का पर्व मनाया जाता है, जो जीवन में नई ऊर्जा, प्रेम और सकारात्मकता का प्रतीक है। होली फाल्गुन पूर्णिमा को आती है, जब सर्दी समाप्त हो चुकी होती है और वसंत ऋतु का आगमन होता है। अतः यह धार्मिक दृष्टि से प्रकृति के नवजीवन का भी उत्सव है।
होलिका दहन के दिन धार्मिक लोगों को विशेष संयम और नियम का पालन करना चाहिए। इस दिन को संयम, शुद्धता और साधना का दिन भी माना गया है। वह सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ और पवित्र कपड़े पहनें। मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहने का संकल्प लें। साथ ही इस दिन उपवास रखें या फिर बहुत थोड़ा-सा सात्विक भोजन करें। तामसिक भोजनों से इस दिन पूर्णतः दूर रहना चाहिए। भगवान विष्णु, श्री कृष्ण या अपने ईष्ट देव की पूजा करनी चाहिए। प्रह्लाद की भक्ति को याद करते हुए ईश्वर से धर्म मार्ग पर चलने की शक्ति देने की याचना करनी चाहिए। इस दिन रोग, कटुवचन और विवादों में पड़ने से बचना चाहिए। मन में क्षमा, प्रेम और शांति का भाव रखना चाहिए।
शाम को होलिका दहन के समय होलिका की अग्नि की तीन से सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। अगर संभव हो तो होलिका की आग में गेहूं की बालियां या चने अर्पित करने चाहिए। इस दिन परिक्रमा तीन या सात बार करना चाहिए। यह प्रार्थना भी करनी चाहिए कि सभी बुराइयां इस अग्नि में जल जाएं। इस तरह होलिका दहन केवल एक परंपरा भर नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का उत्सव है। इ.रि.सें.

