ईश्वर की प्राप्ति के लिए इन्होंने कठोर साधना और भक्ति का सहारा लिया। अपनी साधना से स्वामी जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र ही हैं।
भारत की पवित्र एवं रत्नगर्भा धरती को धन्य करने वाले महान संत स्वामी रामकृष्ण ‘परमहंस’ का पूरा जीवन मानवता के कल्याण के लिए समर्पित था। इसीलिए ये विश्व भर में ‘मानवता के पुजारी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। सदा ही बिलकुल सरल, सहज और परिपूर्ण दिखाई पड़ने वाले रामकृष्ण का संपूर्ण जीवन सादगी भरा था। सिद्धियों एवं आध्यात्मिक शक्तियों के स्वामी होते हुए भी इनके भीतर लेशमात्र भी अहंकार का भाव नहीं था। सन् 1836 में फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को पश्चिम बंगाल के हुगली में कामारपुकुर नामक गांव के एक निर्धन तथा निष्ठावान ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामकृष्ण के जन्म के तुरंत बाद ही ज्योतिषियों ने इनके महान और दिव्य जीवन की घोषणा कर दी थी। यह सुनकर माता चन्द्रा देवी तथा पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय बहुत प्रसन्न हुए थे। अत्यंत सुंदर स्वरूप, ईश्वर प्रदत्त संगीतात्मक प्रतिभा, चरित्र की पवित्रता, गहरी धार्मिक भावनाएं, भौतिक आकर्षणों के प्रति उदासीनता, आकस्मिक रहस्यमयी समाधि और माता-पिता के प्रति अगाध भक्ति ने इन्हें पूरे गांव में आकर्षण का केंद्र बना दिया। इनकी शिक्षा तो साधारण ही हुई थी, किंतु पिता की सादगी और धर्मनिष्ठा का इनके व्यक्तित्व पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा।
रामकृष्ण के बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था। अदभुत प्रतिभा के धनी तथा विलक्षण स्मरणशक्ति वाले रामकृष्ण जब केवल पांच वर्ष के थे, तभी इन्हें अपने पूर्वजों के नामों के साथ-साथ देवी-देवताओं की स्तुतियां, रामायण और महाभारत की कथाएं आदि कंठस्थ याद हो गयी थीं। सन् 1843 में जब ये मात्र सात वर्ष के थे, इनके पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी इनके बड़े भाई रामकुमार पर आन पड़ी। नौ वर्ष की अवस्था में इनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। ब्राह्मण परिवार की परम्परा के अनुसार नवदीक्षित व्यक्ति को इस संस्कार के उपरांत अपने किसी सगे-संबंधी या ब्राह्मण से पहली भिक्षा प्राप्त करनी होती है, लेकिन केवल नौ वर्षीय बालक गदाधर ने परिवार की उस पारंपरिक व्यवस्था को तोड़ते हुए उस लुहारिन से पहली भिक्षा ली, जिसने जन्म से ही रामकृष्ण की सेवा-सुश्रूषा की थी।
रामकृष्ण का विवाह भी बाल्यकाल में ही कर दिया गया। इनकी पत्नी का नाम शारदा था। बालक रामकृष्ण का मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था। इसलिए इनके बड़े भाई इन्हें अपने साथ कोलकाता स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर ले आये, जहां का शांत एवं सुरम्य वातावरण रामकृष्ण को भा गया। बता दें कि दक्षिणेश्वर में रहते हुए रामकृष्ण की आध्यात्मिक साधनाएं जारी रहीं। माता शारदामणि के दक्षिणेश्वर आने तक ये वीतराग ‘परमंहस’ हो चुके थे। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार माता शारदामणि और स्वामी रामकृष्ण परमहंस का संबंध देवी और साधक जैसा था। ये माता शारदामणि के संबंध में अक्सर कहते कि जो मां जगत का पालन करती हैं और जो मन्दिर में पीठ पर प्रतिष्ठित हैं, वही तो यह (शारदामणि) हैं। इसी प्रकार माता शारदामणि इनके संबंध में कहतीं कि ठाकुर के एक बार दर्शन पा लेती हूं, यही क्या मेरा कम सौभाग्य है? कथा है कि जब माता शारदामणि ने अपने अठारहवें वर्ष मे पदार्पण किया तब रामकृष्ण ने दक्षिणेश्वर के अपने कमरे में उनकी ‘षोडशी देवी’ के रुप में आराधना की थी। यही शारदामणि अथवा शारदा देवी बाद में रामकृष्ण संघ में ‘माताजी’ के नाम से प्रतिष्ठित हुईं, जिन्हें आज सभी माता शारदा देवी के रूप में जानते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जीवन द्वैतवादी पूजा के स्तर से क्रमबद्ध आगे बढ़ते हुए आध्यात्मिक अनुभवों द्वारा निरपेक्षवाद की ऊंचाई तक निर्भीक एवं सफल उत्कर्ष के रूप में पहुंचा था।
इन्होंने अपने जीवन काल में ही देख लिया था कि उस सर्वोच्च सŸा अथवा सत्य तक पहुंचने के लिए आध्यात्मिक विचार, द्वैतवाद, संशोधित अद्वैतवाद एवं निरपेक्ष अद्वैतवाद- ये तीनों महान श्रेणियां मार्ग की अवस्थाएं मात्र ही हैं। इनका एक-दूसरे से परस्पर विरोध नहीं, बल्कि मेल है। इसलिए यदि इनको आपस में संपृक्त कर आगे बढ़ा जाए तो ये एक दूसरे की पूरक हो जाती हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों को एक बताते हुए उनकी एकता पर जोर दिया। इन्होंने ‘प्रेम’ को सभी धर्मों का आधार माना। इन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। ईश्वर की प्राप्ति के लिए इन्होंने कठोर साधना और भक्ति का सहारा लिया। अपनी साधना से स्वामी जी इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र ही हैं।
आध्यात्मिक क्षेत्र की यह परंपरा रही है कि गुरुओं की महानता तथा उनकी उपलब्धियों से विश्व को अवगत कराने का कार्य उनके शिष्य और परवर्ती साधक ही करते हैं। इसी प्रकार स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जीवन, विचारों तथा उनकी उपलब्धियों के संबंध में उनके शिष्यों केशवचंद्र सेन और विवेकानंद ने विश्व को बताया। कालांतर में अंततः 16 अगस्त, 1886 को इन्होंने समाधि से ‘महासमाधि’ तक की अपनी यात्रा पूर्ण की।

