एक बार भारतेंदु हरिश्चंद्र कुछ किशोरवय नवोदित रचनाकारों से मिल रहे थे। इस दौरान एक किशोर ने उन्हें खासा प्रभावित किया। वह किशोर हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, बंगाली, और उर्दू भाषाओं पर अच्छा अधिकार रखता था। इतना ही नहीं, उसने अपनी नवीनतम मौलिक कृति ‘प्रेम पुष्पावली’ भी भारतेंदु जी को दिखाई। किशोरवय में इतनी सुंदर भाषा और विद्वता देखकर भारतेंदु जी का मन गद्गद हो गया और उन्होंने उस किशोर का उत्साहवर्धन किया। इसके बाद, उस किशोर ने तीन वर्ष के भीतर ललित निबंध लिखे और अखबार का प्रकाशन भी शुरू कर दिया। वह किशोर हिंदी साहित्य के आकाश में एक नक्षत्र बनकर चमकते रहे। उनका नाम था प्रताप नारायण मिश्र।
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