एक बार वृंदावन में संत प्रद्युम्न जी के पास एक युवक आया। चरण स्पर्श कर बोला, ‘आप कोई ताबीज या मंत्र दीजिए। मुझे जीवन को सफल होते हुए देखना है।’ संत ने ताबीज देते हुए उसे आशीर्वाद दिया और कहा, ‘वत्स! एक बात याद रखना कि तुमको अपने जीवन में सफल बनना है तो भले ही पैर फिसल जाए मगर जुबान कभी नहीं फिसलने देना। इसके लिए खामोश रहना सीखो। मौन क्रोध की सर्वोत्तम चिकित्सा हैं। अपने खिलाफ की जाने वाली बातों को खामोशी से सुन ले। यक़ीन माने वक्त बेहतरीन जवाब देगा। और फिर इस तरह से जो व्यक्ति अच्छी आदतों का आदी हो जाता है उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है।’
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