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मिठास के जुड़ाव से मजबूती

मकर संक्रांति का पावन पर्व था। सत्संग के उपरांत गुरुवर शिष्यों को प्रसाद स्वरूप तिल-गुड़ के लड्डू वितरित कर रहे थे। एक शिष्य ने उनसे तिल-गुड़ के महत्व पर प्रश्न किया। गुरुजी ने अपनी मुट्ठी में कुछ तिल लेते हुए...

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मकर संक्रांति का पावन पर्व था। सत्संग के उपरांत गुरुवर शिष्यों को प्रसाद स्वरूप तिल-गुड़ के लड्डू वितरित कर रहे थे। एक शिष्य ने उनसे तिल-गुड़ के महत्व पर प्रश्न किया। गुरुजी ने अपनी मुट्ठी में कुछ तिल लेते हुए कहा, ‘देखो ये तिल ‘अलगाव’ के प्रतीक हैं। ये अलग-अलग दाने हैं। इसलिए ज़रा सी ठोकर लगते ही बिखर जाते हैं। अलग होने के कारण इनका सामर्थ्य व उपादेयता भी कम हो जाती है।’ फिर उन्होंने लड्डू की ओर इशारा करते हुए समझाया, ‘परंतु जब इन्हीं तिलों को गुड़ की चाशनी में मिलाया जाता है, तो ये बिखरते नहीं हैं। ठीक इसी तरह, जब अलग-अलग स्वभाव वाले व्यक्ति (तिल) आत्मीयता के बंधन (गुड़) के साथ बंधते हैं, तो वे एक ‘संगठन के रूप में मजबूत’ हो जाते हैं।’ मकर संक्रांति का पर्व का एक संदेश यह भी है कि अकेले हम तिल की तरह कमजोर हैं, लेकिन ‘आत्मीय रिश्तों की मिठास’ से जुड़कर गुड़ की मिठास में गुंथे लड्डू की भांति मजबूत हो जाते हैं। जीवन की सार्थकता बिखरने में नहीं, प्रेम से जुड़ने में है।

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