एक बार एक युवक एक शांत आश्रम पहुंचा। वह बोला—‘मैं बहुत कोशिश करता हूं, पर लोग मुझे पहचानते नहीं।’ वृद्ध साधु उसे एक पेड़ के नीचे ले गए और ज़मीन पर गिरे बीज की ओर इशारा किया। बोले—‘यह बीज अभी दिखता नहीं, पर क्या इसलिए वह व्यर्थ है?’ फिर साधु बोले— ‘जो सच में बढ़ता है, वह पहले भीतर जड़ें फैलाता है। शोर ऊपर होता है, शक्ति नीचे।’ युवक को बोध हुआ कि उसकी चिंता पहचान की नहीं, तैयारी की होनी चाहिए। साधु ने अंत में कहा— ‘समय से पहले निकली टहनी टूट जाती है, और धैर्य से पली जड़ें तूफ़ान में भी खड़ी रहती हैं। यही कारण है कि प्रकृति कभी जल्दी नहीं करती, फिर भी सब कुछ समय पर हो जाता है।’ युवक ने साधु से आशीर्वाद लिया और अपने रास्ते चल दिया।
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