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राधा-भाव में अवतरित श्रीकृष्ण

एक बार निकुञ्ज में जब राधा जी श्रीकृष्ण से मिलने आईं, तब राधा जी ने पूछा, “तुम बांसुरी क्यों बजाते हो?” श्रीकृष्ण : “तुम्हें बुलाने के लिए।” राधा जी : “जब तुम बांसुरी बजाते हो, तब मैं सब कुछ भूलकर,...

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एक बार निकुञ्ज में जब राधा जी श्रीकृष्ण से मिलने आईं, तब राधा जी ने पूछा, “तुम बांसुरी क्यों बजाते हो?”

श्रीकृष्ण : “तुम्हें बुलाने के लिए।”

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राधा जी : “जब तुम बांसुरी बजाते हो, तब मैं सब कुछ भूलकर, सब छोड़-छाड़ कर भाग आती हूं और तुम्हारे पास पहुंच जाती हूं।”

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श्रीकृष्ण : “ऐसा क्या है मेरी इस बांसुरी में?”

राधा जी : “कृष्ण, तुम यह प्रेम और विरह कभी नहीं समझोगे। यदि तुम राधा होते, तब तुम्हें पता चलता।”

श्रीकृष्ण : “यदि मैं राधा और तुम कृष्ण होतीं, तो क्या करतीं?”

राधा जी : “फिर जब मैं तुम्हें अपने विरह में तड़पते देखती, तब मुझे भी तुम्हारी तरह अत्यंत आनंद की अनुभूति होती।”

तब कृष्ण बोले—“राधा, यदि ऐसा है तो मैं कलियुग में चैतन्य के रूप में अवतार लूंगा। मेरा शारीरिक रूप कृष्ण का होगा, किन्तु मानसिकता राधा की होगी। मैं राधाभाव लेकर ही अवतरित होऊंगा, क्योंकि मैं जानना चाहता हूं कि वह प्रेम, माधुर्य और सुख कैसा है। मेरी ये तीन अधूरी इच्छाएं हैं—

प्रेम – श्रीराधा का मेरे प्रति जो अद्वितीय प्रेम है, उसकी महिमा और स्वरूप क्या है? वह प्रेम कैसा है?

माधुर्य – उस प्रेम द्वारा श्रीराधा मेरे जिस माधुर्य का आस्वादन करती हैं, वह मेरा माधुर्य कैसा है?

सुख – मेरे माधुर्य का आस्वादन करने से श्रीराधा को जो सुख प्राप्त होता है, वह सुख कैसा है?

इन तीनों अधूरी इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु ही श्रीकृष्ण चैतन्य रूप में श्रीराधा भाव लेकर अवतरित हुए।

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