आध्यात्मिक अभ्यास बुढ़ापे का सहारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। हमें तैयारी ‘सांझ’ में नहीं, बल्कि ‘दिन के उजाले’ में, यानी अभी, इसी क्षण और पूरी शक्ति से करनी चाहिए।
आज की भागम-भाग की ज़िंदगी में हम अक्सर दलील देते रहते हैं कि ईश्वर-आराधना का समय अभी नहीं आया है। अभी बहुत काम पड़ा है; ईश्वर-आराधना के लिए तो पूरी उम्र पड़ी है। अभी करियर बनाना है, घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाऊं तो फिर पूजा-पाठ शुरू करूंगा। कुछ लोग सोचते हैं कि रिटायरमेंट के बाद ही भजन-कीर्तन करेंगे। पूजा-पाठ तो बुढ़ापे में करने की चीज़ है।
समाज में आम धारणा बनी हुई है कि हमारी आध्यात्मिकता और ईश-चिंतन जीवन की सांझ का विषय है। तभी हम लगातार आध्यात्मिक कर्तव्यों के प्रति विमुख रहते हैं। लेकिन हमें जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास नहीं होता। हमने धन, पद, पहचान और प्रतिष्ठा को जीवन की प्राथमिकता बना लिया है। साथ ही आत्मा की साधना को ‘फुर्सत के क्षणों’ की बात मान लिया है।
हम भ्रम में रहते हैं कि पहले सामाजिक जिम्मेदारियां पूरी कर लें, फिर आध्यात्मिक साधना की बात सोचेंगे। हकीकत यह है कि जिम्मेदारियां समुद्री लहरों जैसी होती हैं—एक हटती है तो दूसरी आ जाती है। यदि हम लहरों के थमने की प्रतीक्षा करेंगे, तो कभी आध्यात्मिक सागर में डुबकी नहीं लगा पाएंगे।
सच्चाई यह है कि ईश-चिंतन हमारी प्राथमिकताओं में ही नहीं है। इसकी वजह हमारी चेतना का जाग्रत न होना है। सुप्त चेतना को जगाने के लिए आध्यात्मिकता के आकाश में दो सूत्र हैं। पहला—महर्षि व्यास का ब्रह्मसूत्र ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ और दूसरा—क्रियायोगी परमहंस योगानंद का आह्वान, ‘शेष सब कुछ प्रतीक्षा कर सकता है, परंतु आपकी ईश्वर-खोज प्रतीक्षा नहीं कर सकती।’
भारतीय सनातन परंपरा में ब्रह्मसूत्र का स्थान अत्यंत उच्च और प्रतिष्ठित है। इस महान ग्रंथ का प्रथम सूत्र—‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’—सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का उद्घोष है। यह सूत्र चार शब्दों से मिलकर बना है—‘अथ’ यानी अब, ‘अतः’ अर्थात इसलिए, ब्रह्म यानी परम सत्य और जिज्ञासा का अर्थ जानने की इच्छा।
ब्रह्मसूत्र का पहला शब्द ‘अथ’ जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अब’ या ‘इसके बाद’ है, परंपरागत भाष्यों में इसका अर्थ ‘योग्यता प्राप्ति के बाद’ लिया गया है—जब धर्मग्रंथों का अध्ययन कर लिया हो या अमुक स्तर की तपश्चर्या हो या विवेक-वैराग्य हो गया हो या इस स्तर तक अध्यात्मिक योग्यता हो गई हो आदि तब ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा करो।
वहीं परमहंस योगानंद ने इसका व्यावहारिक भाष्य दिया। उन्होंने ‘अथ’ की परिभाषा को योग्यता से हटाकर अनिवार्यता बना दिया और कहा—‘आपकी ईश्वर-खोज प्रतीक्षा नहीं कर सकती।’ उन्होंने ‘अथ’ को चेतावनी का रूप दे दिया—अभी नहीं जागे तो फिर कब जागोगे। गृहस्थ हों या संन्यासी, पढ़े-लिखे हों या अनपढ़—ईश्वर-खोज का समय ‘अभी’, इसी क्षण है।
दूसरा शब्द ‘अतः’ (इसलिए) गहरे संकेत देता है। हमने जीवन में धन, मान-सम्मान, पारिवारिक सुख-सुविधाएं और सांसारिक उपलब्धियां प्राप्त कर लीं, पर क्या स्थायी शांति मिली? सुख के पीछे भय और संयोग के पीछे वियोग छिपा मिला। चूंकि सांसारिक नश्वर वस्तुएं आत्मा को पूर्ण संतुष्टि नहीं दे सकतीं, इसलिए अब उस परमतत्व की खोज आवश्यक है जो शाश्वत है।
संत कबीर भी इसी सत्य को जनभाषा में कहते हैं—
‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब।’
जीवन एक ऐसे ‘फाइनल एग्ज़ाम’ की तरह है जिसकी कोई ‘डेट-शीट’ नहीं होती। घंटी कभी भी बज सकती है, उत्तर-पुस्तिका छीनी जा सकती है। यह सोचना कि अंतिम क्षणों में ईश्वर-स्मरण कर लेंगे और पार हो जाएंगे, मात्र भ्रम है। आध्यात्मिक अभ्यास बुढ़ापे का सहारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। तैयारी सांझ में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में—यानी अभी, इसी क्षण और पूरी शक्ति से करनी चाहिए।

