रक्षा भाव के साथ आत्मिक बंधन

रक्षा भाव के साथ आत्मिक बंधन

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज

भाई-बहन का रिश्ता आत्मा की तरह पवित्र है। रक्षा बंधन के त्योहार का सार आत्मिक बंधन है। आत्मा से बंधन का भाव जगाता है गुरु का ज्ञान। एक बहन जब अपने भाई को राखी बांधती है तो वह उसकी रक्षा करने का वचन देता है। इसी तरह जीवन के उतार-चढ़ाव से गुरु ही हमें पार लगाते हैं...

भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का बंधन असल में आत्मिक बंधन है। रक्षा का भाव वाला बंधन। रक्षा का भाव आत्मा से आता है। आत्मा से बंधन का भाव जागेगा गुरु के ज्ञान से। गुरु के ज्ञान को वही ग्रहण कर पाएगा जो मनसा, वाचा और कर्मणा के भाव से पवित्र होगा।

गुरु जीवन के उतार-चढ़ाव और संकट में हमारी सहायता करता है। वह हमें दीक्षा देकर एक अदृश्य रक्षाबंधन से बांध देता है, जो पल-पल हमारी रक्षा करता है। पूर्ण सत्गुरु से दीक्षा पाना, यह सुनिश्चित करना है कि हम जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटकर मोक्ष प्राप्त करें। गुरु अपनी तेजोमयी शक्ति से हमें उभारते हैं, ताकि हमारा ध्यान सिमटकर शिवनेत्र पर एकाग्र हो सके। इस शिवनेत्र का ही प्रतिरूप है पूजा में नारियल का चढ़ाया जाना। बाइबल में आता है, ‘यदि तुम्हारी दो आंखों की एक आंख बन जाए तो तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व ज्योतिर्मय हो उठेगा।’ समर्थ सत्गुरु हमें सिद्ध मंत्र देकर, हमारे मन को शांत करता है और हमें इस योग्य बनाता है कि हम आत्मा के केंद्र दिव्य चक्षु पर ध्यान केंद्रित कर सकें। इस बिंदु पर ध्यान केंद्रित होने के बाद हम अपने अन्तर में दिव्य मंडलों की ज्योति और अनहद संगीत का अनुभव करते हैं। अंतरीय ज्योति एवं शब्द पर निरंतर ध्यान एकाग्र करने से हमारी आत्मा देहाभास से ऊपर उठकर दिव्य मंडलों में प्रवेश करती है। वहां सत्गुरु के ज्योतिर्मय स्वरूप से उसका मिलाप होता है। जो आत्मा को उच्च आध्यात्मिक मंडलों में ले जाते हैं अर्थात स्थूल, सूक्ष्म और कारण मंडलों के परे आत्मा के स्रोत, परमात्मा तक। ये दिव्य मंडल, शांति एवं आनंद से पूर्ण हैं। देह रूपी पिंजरे से बाहर आकर हमारी खुशी का पारावार नहीं रहता और हम एक पक्षी की भांति उच्च से उच्चतर रूहानी मंडलों में परवाज़ भरने लगते हैं। अपने स्रोत, परमात्मा से मिलकर जो परम आनंद आत्मा को मिलता है वह अतुलनीय और वर्णनातीत है। तब दोनों मिलकर एक हो जाते हैं। यह दिव्य आनंद और खुशी की अवस्था है। यही हमारे जीवन का परम लक्ष्य है। इस प्रकार का आत्मिक अनुभव और रक्षाबंधन हमें किसी सगे-संबंधी से नहीं मिल सकता। एक संत-सत्गुरु हमें आवागमन के चक्र से छुड़ाकर हमारे जीवन को सार्थक बनाता है। इस तरह वह हमारा सच्चा रक्षाबंधन करता है तथा इस जीवन में और इस जीवन के बाद भी हमारी रक्षा करता है।

इस पूर्णिमा से जुड़े कई पर्व

हिन्दुओं का पवित्र पर्व रक्षा बंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को देशभर में मनाया जाता है। यह पर्व स्लोनो के नाम से भी जाना जाता है, फारसी में जिसका अर्थ है- नववर्ष का दिन। इस दिन बहनें अपने भाइयों की सुख-समृद्धि के लिए उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं और कामना करती हैं कि हर खतरे और कठिनाई में यह राखी उनकी रक्षा करेगी। महाराष्ट्र में इस पर्व पर समुद्र को नारियल अर्पित किए जाते हैं, इसलिए इस दिन को नारियली पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन नारियल फोड़कर किसी नये कार्य को आरम्भ करना शुभ माना जाता है। पारसी लोग इस दिन समुद्र को नारियल भेंट करके जल देवता की अर्चना करते हैं। यह बात अत्यन्त रोचक है कि हमारे प्रत्येक सामाजिक एवं धार्मिक संस्कार- जन्म-मृत्यु, पूजा-पाठ, विवाह, व्रत और त्योहार के साथ नारियल जुड़ा है। यदि हम नारियल को ध्यान से देखें तो हमें इसके ऊपर तीन आंखें बनी हुई दिखती हैं, जिसमें तीसरी आंख, शिवनेत्र की द्योतक है, जो कि दोनों आंखों के मध्य स्थित दिव्य-चक्षु का स्मरण कराती हैं। नारियल के मीठे पानी का स्वाद पाने के लिए हमें उसमें छेद करना होगा। इसी तरह अपने भीतर स्थित प्रभु को पाने के लिए हमारी तीसरी आंख का खुलना जरूरी है।

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