एक बार अब्राहम लिंकन के पास एक युवक आया। वह बहुत क्रोधित था। उसने कहा, ‘मेरे सहकर्मी ने मेरा अपमान किया है। मैं उसे उसी तरह जवाब देना चाहता हूं।’ लिंकन उसे अपने साथ खेत की ओर ले गए। वहां खेतों के बीच एक छोटा रास्ता था, जिस पर कीचड़ जमा था। थोड़ी देर बाद सामने से एक गाड़ी आती दिखी। रास्ता इतना संकरा था कि दोनों गाड़ियां साथ नहीं निकल सकती थीं। लिंकन ने पूछा, ‘अगर दोनों चालक जिद करें कि पहले मैं निकलूंगा, तो क्या होगा?’ युवक बोला, ‘दोनों फंस जाएंगे।’ लिंकन ने शांत स्वर में कहा, ‘जीवन भी ऐसा ही रास्ता है। यदि हम हर बार अपनी जिद पर अड़े रहें, तो आगे बढ़ना कठिन हो जाता है। कभी-कभी पीछे हटना हार नहीं, समझदारी होती है। मैंने अपने जीवन में देखा है कि शांत रहकर समाधान ढूंढ़ने वाले लोग ही सच्चे विजेता होते हैं। क्रोध मन को भारी बनाता है और निर्णय को धुंधला कर देता है।’ युवक का मन शांत हो गया। उसे समझ आया कि प्रतिशोध नहीं, संयम ही सम्मान दिलाता है।
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