महादेवी वर्मा एक बार मोटर दुर्घटना में घायल होकर कुछ दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती रही। इस दौरान उनकी पालतू गिलहरी गिल्लू, जिसे उन्होंने स्वयं मरणासन्न अवस्था से बचाकर पाला था, घर पर अकेली रह गई। जब भी महादेवी के कमरे का द्वार खोला जाता, गिल्लू अपने झूले से उतरकर तेज़ी से दौड़ती, किंतु द्वार पर किसी और को देखकर उसी तीव्रता से वापस अपने घोंसले में लौट जाती। घर के सभी लोग उसे प्रतिदिन उसका प्रिय भोजन काजू देने का प्रयास करते रहे। अस्पताल से लौटने पर जब महादेवी ने गिल्लू के झूले की सफाई की, तो उन्हें वहां काजू के दाने जमा मिले, लगभग अछूते। इससे यह प्रकट हुआ कि गिल्लू ने उन दिनों अपना प्रिय भोजन लगभग त्याग ही दिया था, मानो प्रतीक्षा और विरह में उसकी भूख ही मर गई हो। महादेवी लौटीं तो गिल्लू अस्वस्थ लेखिका के तकिए के पास बैठकर अपने नन्हे पंजों से उनके सिर और बालों को सहलाने लगी, ठीक किसी समर्पित परिचारिका की भांति।
+
Advertisement
Advertisement
Advertisement
×

