राजस्थान के चूरू जिले में स्थित सालासर बालाजी धाम हनुमान जी के अद्वितीय स्वरूप के लिए प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। यहां नारियल बांधकर मन्नत मांगी जाती है, चूरमे का भोग लगाया जाता है और 1759 से अखंड ज्योत निरंतर प्रज्वलित है।
श्री सालासर बाला जी देश में अकेला ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां हनुमान जी दाढ़ी और मूंछों के स्वरूप में विराजमान हैं। यहां हनुमान जी को ‘सीता राम हनुमान’ कहा जाता है। मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर बाईं ओर की दीवार पर सिंदूरी हनुमान जी की छवि अंकित है। भक्त उनके चरणों से अपने माथे पर सिंदूरी तिलक लगाकर, सिक्का चिपका कर भीतर मुख्य बरामदे में दाखिल होते हैं। बाईं ओर मंदिर का प्रसाद बिक्री केंद्र है। भक्त यहां से देसी घी की बूंदी, मोटी बूंदी के लड्डू, चक्की और चूरमा का प्रसाद पेकिंग में ले सकते हैं।
भीतर मुख्य भवन में जाते-जाते दीवारों पर हनुमान जी की कई प्राचीन छवियों और चित्रों के दर्शन होते हैं। भवन के बीचों-बीच सिंदूरी रंग के हनुमान जी के चेहरे के दर्शन पाकर भक्त धन्य महसूस करते हैं। नीचे- ऊपर चारों तरफ ‘राम राम राम...’ अंकित है, और कहीं-कहीं ‘जय श्रीराम’ भी। ऊपर छत्र और बगल में सोने का गदा सजा है। उनके इर्द- गिर्द सोने और चांदी के पत्तरों से भगवानों की उकेरी छवियां हैं।
भक्त पांच-छह क़तारों में दर्शन करते हैं। मुख्य भवन में कुछ सीढ़ियां उतर कर हनुमान जी के सम्मुख पहुंचते हैं। यहीं खड़े-खड़े भक्त दर्शन करते हैं, अपने हनुमान जी से मन की बात करते हैं, अपना-अपना प्रसाद और अपनी-अपनी भेंट चढ़ाते हैं। फिर कुछ सीढ़ियां चढ़कर बाहर निकलते जाते हैं। सभी क़तारें यूं ही सीढ़ियां उतर और चढ़कर चलती जाती हैं। व्यवस्था ऐसी है कि सबसे आख़िरी क़तार वाले भी भली-भांति दर्शन कर लेते हैं।
ऐसी मान्यता है कि नारियल बांधकर मन्नत मांगने से बालाजी महाराज समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। इन्हीं नारियलों की मंदिर परिसर में ही विशाल हवन कुंड में आहुति देकर, भस्म किया जाता है। भस्म को भक्त हनुमान जी के आशीर्वाद और रक्षा के रूप में पुड़ियों में भर-भर कर
भभूति के तौर पर संग घर ले जाते हैं। ज्यादातर भक्त सिंदूरी रंग का गदा जरूर भेंट करते हैं। हनुमान जी के दरबार में गदा अर्पण करके अपनी मन्नत मांगने की प्रथा है। मान्यता है कि भेंट करते-करते ‘जय श्री राम’ का जयकारा लगाने वाले भक्तों से हनुमान जी सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं।
साल 1759 में बना मंदिर
मंदिर राजस्थान के चूरू जिले के सालासर शहर में स्थित है। यह अत्यंत प्रसिद्ध और सिद्धपीठ मंदिर है। मंदिर का इतिहास पौने तीन सौ साल पुराना है। बताया जाता है कि सन् 1755 में नागौर के असोटा नामक गांव में एक किसान को खेत जोतते-जोतते हनुमान जी की दाढ़ी-मूंछ वाली मूरत मिली थी। क्षेत्र के जाने-माने संत मोहनदास महाराज को स्वप्न में मूरत को सालासर लाने का आदेश मिला। सो, उनके प्रयत्न से श्रावण शुक्ल के शनिवार को मूरत सालासर में स्थापित की गई। फिर सन् 1759 में फतेहपुर के कारीगरों नूर मोहम्मद और दाऊ के कर कलमों से मंदिर के भव्य भवन का निर्माण किया गया। संत मोहनदास जी ने तभी यहां ज्योत प्रज्वलित की थी। विश्वास है कि वही अखंड ज्योत आज तक मंदिर में निरंतर जल रही है। जब मूर्ति मिली थी, तब उस किसान की धर्मपत्नी ने बाजरे के चूरमे का भोग लगाया था। तब से आज तक बालाजी को चूरमे का ही भोग लगाया जाता है। इसीलिए मंदिर के बाहर हलवाई की दुकानों और मंदिर के अंदर प्रसाद केंद्र में मोटी बूंदी लड्डू, बूंदी के अलावा चूरमा भी जरूर मिलता है।
मंदिर में दर्शन का क्रम प्रतिदिन सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक जारी रहता है। दिन में तीन आरतियां होती हैं। पहली सुबह 5:30 बजे मंगला आरती, दूसरी शाम 7:15 बजे संध्या आरती और तीसरी रात 10 बजे शयन आरती होती है। साथ- साथ अगले भोर तक किवाड़ बंद हो जाते हैं। हर साल शरद पूर्णिमा और चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जन्मोत्सव) के अवसर पर मेले लगते हैं। सालासर धाम में आडंबर का कोई स्थान नहीं है। यहां भक्त और भगवान का सीधा संबंध है। इसी अटूट विश्वास के चलते असंख्य भक्त दर्शन करने खिंचे आते हैं।
कैसे पहुंचे
सड़क मार्ग से राजस्थान के सभी छोटे-बड़े शहरों से सालासर बालाजी धाम पहुंच सकते हैं। दिल्ली से सड़क दूरी करीब 300 किलोमीटर है। वहां पहुंचने में करीब 6 घंटे लगते हैं। नज़दीकी रेलवे स्टेशन सुजानगढ़ है, जो मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर है। आगे बस या टैक्सी से आ- जा सकते हैं।

