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आस्था, शौर्य और संस्कृति की त्रिवेणी में शक्ति आराधना

मां हाटकालिका

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गंगोलीहाट उत्तराखंड का एक पवित्र धार्मिक स्थल है, जो देवी काली के प्रसिद्ध हाटकालिका मंदिर के लिए जाना जाता है। देवदार वनों से घिरा यह क्षेत्र आस्था, शौर्य और संस्कृति का संगम है। यहां की मान्यताएं, पौराणिक कथाएं और कुमाऊं रेजिमेंट से जुड़ा इतिहास इसे विशेष महत्व प्रदान करता है।

उत्तराखंड का गंगोलीहाट, जिसे देवभूमि भी कहा जाता है, वास्तव में देवी-देवताओं की आराधना का प्रमुख केंद्र है। यहां हर स्थान पर किसी न किसी रूप में देवी-देवताओं की उपस्थिति और संरक्षण की मान्यता देखने को मिलती है। विशेष रूप से देवी काली, जिन्हें यहां रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है, भारतीय सेना की भी आराध्य देवी मानी जाती हैं। कुमाऊं रेजिमेंट की यह आराध्य देवी हैं, और माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

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लगभग 1760 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर सातवीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। यह कत्यूरी राजाओं के राज्य क्षेत्र में आता था और उनके प्रभाव के स्पष्ट संकेत यहां देखने को मिलते हैं। गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ के मार्ग पर स्थित है और यह स्थान अपनी प्राचीन तथा भूमिगत गुफाओं के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग सौ मीटर पैदल मार्ग तय करना होता है।

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आस्था और जनजीवन

गंगोलीहाट पहुंचकर पहाड़ी जीवन और यहां के सरल, धार्मिक लोगों की आस्था का सहज अनुभव होता है। जब लोग यह सुनते हैं कि आगंतुक सेना की आराध्य देवी के दर्शन के लिए आए हैं, तो उनके मन में स्वतः ही श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जाता है।

महिमा और मंदिर परंपरा

हाटकालिका मंदिर न केवल गंगोलीहाट बल्कि पूरे उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण आस्था केंद्र है। मंदिर प्रातः 5 बजे से रात्रि 9 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। देवदार के वृक्षों से घिरा यह मंदिर उत्तर भारत की पारंपरिक मंदिर शैली का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। नवरात्रि के दौरान यहां भारी भीड़ उमड़ती है।

मान्यताएं और कुमाऊं रेजिमेंट

मान्यता है कि मां काली ने यहां सुमैया नामक राक्षस का वध किया था। मंदिर की पहली सीढ़ी उतरते ही मां काली की भव्य मूर्ति श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यह मंदिर कुमाऊं रेजिमेंट की भी आराध्य देवी का स्थान है। कहा जाता है कि रेजिमेंट किसी भी अभियान पर जाने से पहले मां के चरणों में शीश नवाकर ही प्रस्थान करती है। मां को शौर्य और साहस प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। सन‌् 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद सूबेदार शेर सिंह के नेतृत्व में यहां महाकाली की मूर्ति स्थापित की गई थी।

परंपराएं, स्मृतियां और स्थानीय जीवन

यहां दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु मां को अर्पित चुनरी प्रसाद स्वरूप अवश्य लेकर जाते हैं, जिसे मंदिर के आसपास की दुकानों से प्राप्त किया जा सकता है। मान्यता है कि यह चुनरी घर के सभी शुभ कार्यों में शुभता का प्रतीक होती है।

गंगोलीहाट में पारंपरिक पहाड़ी बाखली आज भी देखने को मिलती है, जहां पुराने समय की जीवनशैली के अवशेष जैसे कमरे, चक्की आदि संरक्षित हैं।

स्थानीय अनुभव और पर्यटन

यहां जड़ी-बूटियों की खेती भी की जाती है। ग्रामीण लोग आगंतुकों का आत्मीयता से स्वागत करते हैं और पारंपरिक पेय भी परोसते हैं। गंगोलीहाट में एक साथ कई धार्मिक स्थलों के दर्शन किए जा सकते हैं, इसलिए कम से कम दो दिन का प्रवास उपयुक्त माना जाता है।

पास में पाताल भुवनेश्वर और चकौड़ी जैसे स्थान भी दर्शनीय हैं, जहां कस्तूरी मृगों का क्षेत्र और प्राकृतिक गुफाएं प्रमुख आकर्षण हैं। यहां के स्थानीय समोसे भी अपनी विशिष्ट स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं।

यात्रा मार्ग

गंगोलीहाट पहुंचने के लिए काठगोदाम सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन है, जहां से बस और अन्य परिवहन सुविधाएं उपलब्ध हैं।

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