क्रीमिया युद्ध के दौरान ब्रिटिश सैनिक बड़ी संख्या में बीमार पड़ रहे थे। युद्ध से अधिक मौतें गंदगी, संक्रमण और अव्यवस्थित अस्पतालों के कारण हो रही थीं। सरकार और सैन्य अधिकारी इसे युद्ध की अपरिहार्य क्षति मानकर अनदेखा कर रहे थे। जब फ्लोरेंस नाइटिंगेल वहां पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि घायल सैनिक गंदे कमरों में पड़े हैं, साफ पानी और उचित भोजन तक उपलब्ध नहीं है। फ्लोरेंस ने सबसे पहले सफाई पर ध्यान दिया। रात-दिन स्वयं दीपक लेकर वार्डों में घूमतीं, सैनिकों की देखभाल करतीं और नर्सों को अनुशासन सिखातीं। उन्होंने नालियों की सफाई, स्वच्छ बिस्तर और स्वच्छ भोजन की व्यवस्था करवाई। प्रारंभ में उनका विरोध हुआ, लेकिन वे अपने उद्देश्य पर अडिग रहीं। कुछ ही समय बाद मृत्यु दर में आश्चर्यजनक रूप से कमी आई। सैनिकों के मनोबल में वृद्धि हुई और अस्पतालों का वातावरण बदल गया। जो अधिकारी पहले उन्हें अव्यावहारिक मानते थे, वही अब उनके निर्णयों का अनुसरण करने लगे। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि वे इतनी कठिन परिस्थितियों में भी थकती क्यों नहीं। फ्लोरेंस ने उत्तर दिया, ‘जब किसी का दर्द आपकी जिम्मेदारी बन जाए, तब थकान स्वयं पीछे हट जाती है। सेवा तब तक सार्थक नहीं होती, जब तक उसमें करुणा और अनुशासन दोनों न हों।’
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