एकदा

निःस्वार्थ दिव्य प्रेम

निःस्वार्थ दिव्य प्रेम

परमहंस योगानंद जी अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर जी के आश्रम में मुकुन्द नामक एक किशोर शिष्य थे। एक दिन मुकुन्द को लगा कि गुरु के आश्रम की अपेक्षा हिमालय के एकांत में ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करना आसान होगा। इसलिए मुकुन्द ने अपने गुरु का आश्रम छोड़कर हिमालय जाने का निर्णय लिया। रास्ते में उनकी मुलाकात एक सिद्ध संत से हुई। उस संत ने मुकुन्द से कहा, ‘तुम अपने सद‍्गुरु से दूर क्यों भाग रहे हो। उनके पास वह सब कुछ है, जिसकी तुम्हें आवश्यकता है। इसलिए अपने गुरु के पास लौट जाओ।’ मुकुन्द अपने गुरु के पास वापस लौट आए। मुकुन्द को आशा थी कि उनके गुरु आश्रम छोड़कर भाग जाने के कारण बहुत डांट लगाएंगे, परंतु यह देखकर मुकुन्द को आश्चर्य हुआ कि उनके गुरु ने अपने शिष्य की गलती पर निंदा का एक शब्द भी नहीं कहा। मुकुन्द ने अपने गुरु से पूछा, ‘गुरुदेव! मैंने सोचा था, मेरे इस प्रकार आश्रम छोड़ देने के कारण आप बहुत नाराज होंगे।’ स्वामी युक्तेश्वर जी ने कहा, ‘नहीं, बिल्कुल नहीं। क्रोध केवल इच्छा के अवरोध से उत्पन्न होता है। मैं कभी दूसरों से कोई अपेक्षा नहीं रखता। मैं तो केवल तुम्हारी सच्ची प्रसन्नता में प्रसन्न हूं। साधारण प्रेम में स्वार्थ होता है, जबकि दिव्य प्रेम निःस्वार्थ होता है।’ प्रस्तुति : मधुसूदन शर्मा 

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