एक संत आश्रम में प्रवचन कर रहे थे। संत ने वैदिक साहित्य में वर्णित उद्धरणों का हवाला देकर कहा कि मनुष्य को धन का उपयोग इंद्रियों के संयम के साथ जरूरत के अनुसार करना चाहिए। धन इतना ही रखना चाहिए जो जीवनयापन के लिए जरूरी हो और मुश्किल वक्त में काम आ सके। इंसान को धन का एक अंश परोपकार की मंशा से जरूरतमंदों को दान कर देना चाहिए। संत के प्रवचन के बाद शिष्यों में धन संग्रह व उसके उपयोग को लेकर तर्क-वितर्क होने लगे। कई शिष्य कहने लगे कि यदि धन सुरक्षित रखा जा सके तो संग्रह में क्या बुराई है। यही सवाल एक शिष्य ने संत से पूछा कि पुरुषार्थ व मेहनत से अर्जित धन यदि सुरक्षित रूप से रखा जा सके तो क्या बुराई है? संत बोले : ये ठीक ऐसा ही होगा जैसा मधुमक्खियों द्वारा कठिन मेहनत से एकत्र पराग से बना शहद जमा करना, जिसकी मिठास हमेशा ही दूसरे लोगों व जीवों के ही काम आती है।
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