यह प्रसंग उस समय का है जब प्रोफेसर हरीश चंद्र कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में महान भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक के विद्यार्थी थे। एक दिन उन्होंने देखा कि डिराक भौतिकी की समस्याओं को हल करने के लिए जिन तर्कों का उपयोग कर रहे थे, वे गणित के दृष्टिकोण से पूरी तरह ठोस नहीं थे। प्रोफेसर हरीश चंद्र ने उनसे पूछा, ‘क्या यह समीकरण गणितीय रूप से हर स्थिति में सही है?’ इस पर डिराक ने जवाब दिया, ‘मुझे बस इस बात में दिलचस्पी है कि क्या यह प्रकृति के अनुरूप काम करता है और उसके अनुसार सही है।’ प्रोफेसर हरीश चंद्र को डिराक की यह बात पसंद नहीं आई। उन्होंने महसूस किया कि भौतिकी में कई बार अनुमान लगाने पड़ते हैं, जबकि उनका मन ऐसी पूर्णता चाहता था, जहां कोई संदेह न बचे। इसी सटीकता की तलाश में उन्होंने गणित को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। उन्होंने गणित में ‘प्रेजेंटेशन थ्योरी’ और ‘हार्मोनिक एनालिसिस’ के क्षेत्र में ऐसे कार्य किए, जिसे पूरी दुनिया के गणितज्ञों ने एक चमत्कार माना। प्रोफेसर हरीश चंद्र गणित में इतने खोए रहते थे कि वे आधी रात को भी ब्लैकबोर्ड पर समीकरण लिखते हुए पाए जाते थे। भारत के प्रोफेसर हरीश चंद्र ऐसे महान गणितज्ञ थे जिन्होंने गणित को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं।
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