प्राचीन चीन में कन्फ्यूशियस अपने संतुलित, व्यावहारिक और सहज ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन वे अपने शिष्यों के साथ नगर से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक युवक झील के किनारे बैठा दुखी होकर रो रहा था। कन्फ्यूशियस उसके पास गए और पूछा, ‘क्या तुम्हारा कोई बड़ा नुकसान हुआ है?’ युवक बोला, ‘गुरुजी, मैं एक छोटे पद पर काम करता हूं। लोग मेरी बात नहीं सुनते। मैं जितनी मेहनत करता हूं, उतना ही उपहास मिलता है। मैं सम्मान चाहता हूं, पर उसे पाने का मार्ग नहीं समझता।’ कन्फ्यूशियस शांत होकर जमीन पर बैठ गए। उन्होंने लकड़ी से मिट्टी पर एक वृत्त बनाया और बोले, ‘देखो, यह वृत्त समाज है बड़ा, विस्तृत और विविध।’ फिर बीच में एक छोटा-सा बिंदु बनाकर बोले, ‘और यह तुम हो, अपनी जगह छोटा, पर अपूर्ण नहीं।’ युवक ने पूछा, ‘तो सम्मान कैसे मिलेगा?’ कन्फ्यूशियस ने मिट्टी पर धीरे से रेखाएं खींचना शुरू किया। बिंदु से बाहर की ओर, वृत्त को छूने तक। वे बोले, ‘सम्मान मांगने से नहीं, फैलने से मिलता है। जब तुम्हारा ज्ञान, धैर्य और कर्म बाहर की ओर बढ़ते हैं, तब समाज स्वयं तुम्हें पहचानता है।’ फिर उन्होंने एक सरल वाक्य कहा, ‘पहले अपने भीतर आकार लो, फिर दुनिया में स्थान मिलेगा।’ युवक के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने समझ लिया कि सम्मान कोई उपहार नहीं, बल्कि धीरे-धीरे अर्जित होने वाली छवि है।
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