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शब्दों की गरिमा का सम्मान

एकदा

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धोती-कुर्ता पहने साधारण से दिखने वाले एक बुजुर्ग को खचाखच भरी ट्रेन में जब बैठने को कोई जगह नजर नहीं आई तो सहसा उसकी निगाह ट्रेन की उस बोगी पर पड़ी जिसके बाहर लिखा था—रिजर्व्ड फॉर मिलिट्री। खिड़की के पास बैठे किसी फौजी से विनती करके वह बुजुर्ग उस बोगी में चढ़ गया और चुपचाप एक सीट पर जा बैठा। ट्रेन चलने पर एक फौजी ने जब उससे पूछा कि आप क्या काम करते हैं तो उत्तर मिला कि मैं एक कवि हूं और गीत वगैरा लिखता रहता हूं। जब उस फौजी ने कहा कि अपना लिखा कोई गीत हमें भी सुनाइए तो बुजुर्ग ने कहा, ‘लता मंगेशकर द्वारा गाया मेरा एक गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी’ तो शायद आपने सुना ही होगा!’ यह मालूम पड़ने पर कि साधारण-सा दिखने वाला यह आदमी कोई और नहीं, बल्कि गीतकार प्रदीप हैं तो बोगी में सवार हरेक फौजी ने आकर उनके चरण छुए और खुद को धन्य महसूस किया। बुजुर्ग कवि हैरान थे कि इन फौजियों को हो क्या गया है! इतना सम्मान दिए जाने का कारण पूछने पर एक फौजी ने बताया, ‘देशप्रेम को लेकर यूं तो बहुत से गीत लिखे गए हैं, किंतु ‘हिंद की सेना की जय’ जैसे लफ्ज़ पहली बार आपने ही अपने गीत में प्रयोग किए हैं और आपको नहीं पता कि आपके ये लफ्ज़ हमारे लिए कितने अनमोल हैं!’

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