एक रात युद्ध से पहले कृष्ण ने कर्ण से पूछा, ‘कर्ण, यदि तुम्हें पता है कि पांडव धर्म के पक्ष में हैं, तो फिर दुर्योधन का साथ क्यों दे रहे हो?’ कर्ण मुस्कुराया और बोला, ‘माधव, सत्य को पहचान लेना और अपने मित्र को संकट में छोड़ देना - दोनों अलग बातें हैं। मैं जानता हूं कि पांडव धर्म के पक्ष में हैं, लेकिन मैं उस मित्र का साथी भी हूं, जिसने मुझे तब अपनाया जब पूरी दुनिया ने ठुकराया था, जो मेरे हर अपमान के आगे खड़ा रहा। यदि विजय ही सब कुछ होती, तो संसार में वफादारी का कोई मूल्य न होता। मैं हार सकता हूं, मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता हूं, पर उस मित्र का साथ नहीं छोड़ सकता जिसने मुझे उस दिन राजा बनाया - जब मैं सिर्फ एक सूत पुत्र था। मित्र का धर्म केवल सही पक्ष चुनना नहीं, बल्कि अंतिम श्वास तक अपने मित्र का सम्मान करना भी है।’ कहते हैं उस क्षण कृष्ण की आंखें नम हो गईं।
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