दिल्ली की एक अदालत में कमरा भीड़ से खचाखच भरा था। न्यायाधीश की किसी व्यवस्था से क्षुब्ध होकर अपराधी ने अपनी चप्पल उतारी और निशाना साधकर न्यायाधीश की ओर उछाली। क्षण भर में अदालत में सन्नाटा छा गया। वहां उपस्थित लोगों और पुलिस अधिकारियों के चेहरे क्रोध से तमतमा उठे। कुछ सिपाही अभियुक्त की ओर बढ़े। तभी न्यायाधीश ने उन्हें रोककर कहा, ‘इसे कुछ मत कहिए। न इसे पीटिए। अपने किये पर यह खुद पश्चाताप करेगा। आत्म-ग्लानि ही इसके लिए सबसे बड़ा दंड होगा।’ सिपाहियों के बढ़ते कदम रुक गए। अभियुक्त के मन में भीषण संघर्ष चल रहा था। सुनवाई खत्म हो चुकी थी। सिपाही ने अभियुक्त को ले जाने के लिए उसका हाथ पकड़ा। पर अभियुक्त ने क्रोध से उसका हाथ झटक दिया। लोग एक बार फिर सकते में आ गये। पर अगले ही क्षण अभियुक्त ने न्यायाधीश के सामने लगी लकड़ी की रेलिंग पर बार-बार अपना सिर पटकना शुरू कर दिया। वह पश्चाताप की आग में जल रहा था। न्यायाधीश के चेहरे पर संतोष की आभा थी। मनुष्यता में उनके विश्वास को एक और प्रमाण मिल गया था।
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