26 सितंबर, 1983 की रात सोवियत संघ के एक गुप्त सैन्य नियंत्रण केंद्र में ड्यूटी पर तैनात अधिकारी स्टैनिस्लाव पेट्रोव अपनी निगरानी प्रणाली पर नज़र रखे हुए थे। अचानक चेतावनी सायरन बज उठा। कंप्यूटर ने संकेत दिया कि अमेरिका की ओर से परमाणु मिसाइल दागी गई है। कुछ ही क्षण बाद दूसरी, फिर तीसरी, फिर पांच मिसाइलों का संकेत दिखाई दिया। सैन्य नियम स्पष्ट थे—तुरंत उच्च अधिकारियों को सूचना भेजी जाए, ताकि जवाबी कार्रवाई की जा सके। कमरे में तनाव फैल गया। सभी की नज़र पेट्रोव पर थी। उन्होंने स्क्रीन को ध्यान से देखा। उन्हें कुछ असामान्य लगा। यदि वास्तव में परमाणु युद्ध शुरू होता, तो केवल पांच मिसाइलें क्यों दागी जातीं? उन्होंने कुछ क्षण और प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया। यह निर्णय नियमों से अधिक उनके विवेक पर आधारित था। कुछ मिनट बाद स्पष्ट हो गया कि कंप्यूटर प्रणाली ने सूर्य की किरणों के परावर्तन को मिसाइल समझ लिया था। कोई हमला नहीं हुआ था। यदि उस रात पेट्रोव केवल मशीन पर भरोसा कर लेते, तो इतिहास की दिशा कुछ और हो सकती थी। उन्होंने वर्षों तक इस घटना का उल्लेख सार्वजनिक रूप से नहीं किया। बाद में जब तथ्य सामने आए, तब दुनिया को पता चला कि एक शांत अधिकारी ने घबराहट के बजाय धैर्य चुना था। उनसे एक बार पूछा गया कि उस रात सबसे कठिन काम क्या था। उन्होंने उत्तर दिया, ‘निर्णय लेना नहीं, निर्णय लेने से पहले सोचना।’ प्रस्तुति : देवेन्द्रराज सुथार
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