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Pitra Paksha 2026 : जब भगवान शिव पर लगा ब्रह्महत्या का पाप, बद्रीनाथ का वो रहस्यमयी तीर्थ जहां अलग हुआ ब्रह्मा का सिर

ब्रह्मकपाल में क्यों किया जाता है पिंडदान? भगवान शिव से जुड़ी है रहस्यमयी पौराणिक कथा

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Pitra Paksha 2026 : पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम स्थित ब्रह्मकपाल तीर्थ में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी है। खराब मौसम और बारिश के बीच भी देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां अपने पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान करने पहुंच रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं में ब्रह्मकपाल को पितरों की आत्मशांति और मोक्ष से जुड़ा विशेष तीर्थ माना जाता है।

बद्रीनाथ के पास क्यों खास है ब्रह्मकपाल?

अलकनंदा नदी के किनारे बद्रीनाथ मंदिर से करीब 200 मीटर की दूरी पर स्थित ब्रह्मकपाल को कपाल मोचन तीर्थ भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी वजह से पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। पितृपक्ष के पहले दिन ही देश के विभिन्न राज्यों से आए लोगों ने पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण किया।

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जब भगवान शिव पर लगा ब्रह्महत्या का पाप

ब्रह्मकपाल से जुड़ी पौराणिक कथा भगवान शिव और ब्रह्मा से संबंधित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक प्रसंग में भगवान शिव ने क्रोधित होकर भगवान ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था। इसके बाद ब्रह्मा का वह सिर भगवान शिव के त्रिशूल से चिपक गया। मान्यता है कि ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव तीनों लोकों में विचरण करते रहे। जब वह बद्रीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल पहुंचे, तो ब्रह्मा का सिर उनके त्रिशूल से अलग हो गया। इसी वजह से इस स्थान को ब्रह्मकपाल और कपाल मोचन नाम मिला।

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देशभर से पहुंच रहे श्रद्धालु

पितृपक्ष के पहले दिन दिल्ली, राजस्थान, बंगाल, दक्षिण भारत और नेपाल समेत कई जगहों से श्रद्धालु बद्रीनाथ पहुंचे। बारिश और खराब मौसम के बावजूद ब्रह्मकपाल में सुबह से ही श्राद्ध कर्म जारी रहा। श्राद्ध में चावल, जौ और काले तिल से पिंडदान किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, पितरों को भोजन अर्पित करने के साथ गाय, कौए और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी है। चावल की खीर को भी श्राद्ध कर्म में विशेष महत्व दिया जाता है।

गया और काशी की तरह ब्रह्मकपाल भी खास

देश में गया, काशी समेत कई तीर्थस्थलों पर पिंडदान की परंपरा है। हालांकि, बद्रीनाथ का ब्रह्मकपाल पितरों के मोक्ष से जुड़ी अपनी अलग धार्मिक मान्यता के कारण विशेष महत्व रखता है। पितृपक्ष में यहां पहुंचकर श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मशांति और मोक्ष की कामना करते हैं।

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