युद्ध खत्म होने के बाद सिपाही विलियम स्कॉट रात के पहरे पर था। दिन की ड्यूटी करके अपने साथी सैनिक के स्थान पर वह दोबारा ड्यूटी पर तैनात हुआ था। थकावट के कारण खड़े-खड़े उसे नींद आ गई। तभी एक उच्च अधिकारी ने विलियम को रंगे हाथों पकड़ लिया। न्यायालय ने उसको प्राणदंड की सजा सुना दी। संयोग से राष्ट्रपति लिंकन को विलियम स्कॉट के प्राणदंड की खबर मिली तो वे सिपाही के पास जा पहुंचे। विलियम उनके पांवों से लिपट गया। राष्ट्रपति ने विलियम को उठाते हुए कहा, ‘मैं तुम्हें इस सजा से छुड़वा दूंगा, मगर तुम्हें मेरा कर्ज चुकाना पड़ेगा।’ ‘मैं अपनी जान की खातिर घर-बार बेचकर पांच-छह सौ डालर भेंट कर सकता हूं।’ स्कॉट बोला। ‘मगर मांग इससे बहुत ज्यादा है। इसे तुम्हारे हितैषी और बाप-दादा नहीं चुका सकते। इसे सिर्फ तुम्हें चुकता करना होगा।’ लिंकन ने दृढ़ता से कहा। ‘मगर कैसे?’ स्कॉट ने सवाल किया। राष्ट्रपति ने उत्तर दिया कि, ‘यदि तुम ताउम्र ईमानदारी से काम करोगे तो मैं समझूंगा कि तुमने मेरा कर्ज चुका दिया।’ स्कॉट ने उनको यकीन दिलाया। कुछ दिनों बाद पुनः युद्ध छिड़ा तो स्कॉट जोश-खरोश से लड़ाई में कूद पड़ा और वीरता से लड़ते-लड़ते शहीद हो गया। वीरगति पाने से कुछ समय पूर्व विलियम ने राष्ट्रपति को एक संदेश भिजवाया, जिसमें लिखा था, ‘महोदय, मैंने अपना कर्ज चुका दिया है।’
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