एक भूल और स्वर्ग में भोजन की जगह खाने को मिला सोना... दानवीर कर्ण की से जुड़ी पितृपक्ष की कहानी
पितृपक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध और तर्पण?
पितृपक्ष शुरू होते ही घर-परिवार में पूर्वजों को याद करने और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान करने की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए पूजा-पाठ और दान-पुण्य करते हैं। इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक माना जा रहा है। इसे कई जगह श्राद्धपक्ष, कनागत और करणागत के नाम से भी जाना जाता है।
मान्यता है कि पितृपक्ष के 16 दिनों में शुभ और मांगलिक कार्यों से दूरी रखी जाती है। लोग पवित्र नदियों के घाटों पर जाकर पितरों का तर्पण करते हैं और अन्न, तिल, चावल, जौ, घी व शहद से बने पिंड अर्पित करते हैं। इसके साथ ही जरूरतमंदों को भोजन और वस्तुओं का दान भी किया जाता है।
पितरों के लिए क्यों किया जाता है श्राद्ध?
धार्मिक मान्यताओं में पितरों को विशेष स्थान दिया गया है। माना जाता है कि श्राद्ध और तर्पण के जरिए पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध और दान-पुण्य किया जाना चाहिए। परंपरा में कौआ, गाय, कुत्ते और चींटियों के लिए भोजन निकालने की भी मान्यता है। इसके बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने और दान करने की परंपरा निभाई जाती है।
स्वर्ग में कर्ण को भोजन की जगह क्यों मिला सोना?
पितृपक्ष से जुड़ी सबसे चर्चित कथाओं में महाभारत के महान दानवीर कर्ण की कहानी भी शामिल है। लोकप्रचलित कथा के अनुसार, जब कर्ण का निधन हुआ और वह स्वर्ग पहुंचे तो उन्हें भोजन के लिए सोना दिया गया। इसपर कर्ण हैरान रह गए। तब उन्हें बताया गया कि उन्होंने पृथ्वी पर जीवनभर सोने और कीमती वस्तुओं का खूब दान किया, लेकिन पितरों के लिए अन्न-जल का दान और तर्पण नहीं किया था। इसलिए स्वर्ग में उन्हें वही प्राप्त हुआ, जिसका उन्होंने सबसे अधिक दान किया था। हालांकि कर्ण के पुण्य इतने अधिक माने गए कि उन्हें अपनी इच्छा पूरी करने का अवसर दिया गया।
15 दिन धरती पर लौटे कर्ण और किया दान
कथा के अनुसार, कर्ण ने भगवान से प्रार्थना की कि उन्हें कुछ समय के लिए पृथ्वी पर वापस भेज दिया जाए, ताकि वह अपने पितरों के लिए अन्न-जल का दान और तर्पण कर सकें। उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई और उन्हें 15 दिनों के लिए धरती पर लौटने का अवसर मिला। इसके बाद कर्ण ने इन दिनों में अन्न, जल और दूसरी आवश्यक वस्तुओं का खूब दान किया और पितरों का तर्पण किया। मान्यता है कि इसी कथा से पितृपक्ष और करणागत से जुड़ी परंपराओं को विशेष महत्व मिला।
आज भी निभाई जाती है परंपरा
पितृपक्ष में आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं। दिल्ली, राजस्थान और उत्तराखंड से लेकर गया जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों तक लोग पिंडदान और तर्पण करते हैं। धार्मिक मान्यता चाहे जो हो, यह परंपरा परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने, उनके प्रति सम्मान जताने और जरूरतमंदों की मदद करने का संदेश भी देती है।
डिस्केलमनर: यह लेख/खबर धार्मिक व सामाजिक मान्यता पर आधारित है। dainiktribneonline.com इस तरह की बात की पुष्टि नहीं करता है।

