एकदा : The Dainik Tribune

एकदा

शुभता का भाव

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वनवास के दिनों में एक बार एक ऋषि कन्या का सीता जी से वार्तालाप हुआ। सीता के समभाव ने उसे हैरान कर दिया तो वह पूछ बैठी, ‘कहां आप राजा जनक की लाड़ली और कोसल नरेश दशरथ की पुत्रवधू और कहां यहां जंगल में सूखी लकड़ी बीन रही हैं। आपको तो मन ही मन अतीव पीड़ा होती होगी न।’ ‘नहीं, न पीड़ा न दुख, कभी नहीं।’ ‘पर कैसे नहीं?’ ऋषि कन्या ने प्रति प्रश्न किया। ‘वो इसलिए कि मैंने एक हल खोजा है, वह यह कि यदि कोई काम या माहौल दुख दे रहा है तो उस दर्द को अपनी अच्छी विचारधारा से उड़ा दो, फिर वो काम और परिवेश कभी भी पीड़ा नहीं देता, यानी शुभता का भाव तो भीतर ही है।’

प्रस्तुति : पूनम पांडे

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