एकदा : The Dainik Tribune

एकदा

उदारता के संत

एकदा

संत दादू अपनी सादगी और सहनशीलता के लिए विख्यात थे। एक बार एक कोतवाल घोड़े पर सवार होकर उनके दर्शन के लिए आए। संत दादू फटे-पुराने कपड़े पहने, एक पेड़ की छाया में बैठे थे। कोतवाल ने घोड़े पर बैठे-बैठे ही कड़क आवाज में पूछा, ‘अरे... ओ... बूढ़े, तुम जानते हो कि संत दादू दयाल कहां रहते हैं?’ दादू शांत भाव से बैठे रहे। कोतवाल ने उनके इस व्यवहार को अपमान समझा। उसने घोड़े से उतर कर दादू साहिब को तीन-चार थप्पड़ रसीद कर दिए। दादू साहिब मंद-मंद मुस्कराते रहे। कोतवाल ने आगे चलकर, एक व्यक्ति से दादू साहिब के बारे में पूछा। व्यक्ति पेड़ की छांव में बैठे आदमी की ओर इशारा करके बोला, ‘वही संत दादू हैं।’ कोतवाल सन्न रह गया। वह पछताने लगा। वह संत के चरणों में गिरकर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘मुझे माफ कर दीजिए। मैं तो आपको अपना गुरु बनाने आया था।’ संत दादू दयाल ने उसे अपनी बांहों में भरकर कहा, ‘यदि कोई एक टके का घड़ा भी खरीदता है तो उसको भी ठोक-बजाकर देखता है। तुम तो मुझे अपना गुरु बनाने आए थे, गुरु पक्का है या कच्चा, ठोक बजाकर परख लेना चाहिए। तुमने भी वही किया। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा

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