एकदा

राष्ट्र की जरूरत

एकदा

बात उन दिनों की है जब महात्मा गांधी देश का दौरा कर रहे थे। दौरे के बीच एक दिन सोदपुर में ठहर गये। वहां भगीरथ कनोडिया के परिवार की कुछ महिलाएं बापू के दर्शन के लिए पधारीं। श्रद्धावश उन्होंने बापू को उपहार स्वरूप कुछ रुपये दिये। वे बोले, ‘बस इतने ही रुपये?’ पास ही सीताराम सेकसरिया बैठे थे। वे बोले, ‘बड़े आश्चर्य की बात है, बापू! आपको हजारों रुपये सहयोग के रूप में जनता देती है, फिर भी आपकी पूर्ति नहीं होती?’ बापू मुस्कुराकर बोले, ‘आपका कहना सही है। मेरी पूर्ति कैसे हो सकती है? किसी एक व्यक्ति की जरूरत हो तो पूरी हो, मुझे तो पूरे भारत की जरूरतों की पूर्ति करनी है।’ प्रस्तुति : पुष्पेश कुमार पुष्प

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