एकदा

बादशाह का दर्द

एकदा

मुगल बादशाह शाहजहां आगरा किले में अपनी औलाद से धोखा खाने के दर्द को रंग-कूची से कागजों पर उतारने लगे थे वहीं खुद को बहलाने के लिए बच्चों को चित्रकारी तक सिखाने लगे थे। कक्षा के दौरान उन्होंने एक बच्चे से पूछा, ‘देखें, तुमने क्या बनाया है?’ बच्चा बोला, ‘गुलाब का फूल।’ उन्होंने समझाया, ‘बरखुरदार, इसके नीचे डंडी, पत्तियां और कांटे बनाओ। तभी तस्वीर पूरी होगी। जैसे सुख- दुख अंग-संग रहते हैं, वैसे ही गुलाब के पौधे पर फूल और कांटे भी।’ शाहजहां अगले बच्चे की तरफ मुड़े। वह दिखाते हुए बोला, ‘मैंने नदी बनाई है।’ शाहजहां ने शाबाशी दी, बताया, ‘लेकिन इसमें भंवर बनाओ, नाव फंसाओ। भंवर के बिना नदी का वेग जान ही नहीं सकते। यूं ही जैसे इंसान बगैर हादसे के जिंदगी का असली मतलब नहीं जान पाता।’ तीसरे बच्चे की तस्वीर देखी-‘बिल्ली और उसके बच्चे।’ शाहजहां ने सवाल किया, ‘अरे! तुमने एक बच्चा बिल्ली के मुंह में क्यों डाल दिया है?’ बच्चा बोला, ‘जब बिल्ली के बच्चे पैदा होते हैं, तब उसे जोर से भूख लगती है। उसे खाने को कुछ न मिले, तो अपने ही बच्चे को खा जाती है।’ अब शाहजहां ने बच्चों से पूछा, ‘तुम ऐसे जानवर को जानते हो, जिसके बच्चे बड़े होकर अपने मां-बाप को ही खा जाते हैं? नहीं न। लेकिन तुम तब जानोगे, जब मेरी तरह बूढ़े हो जाओगे। जब तुम्हारे बेटे औरंगजेब की तरह जवान होंगे।’ छुट्टी करने के बाद वह खुद से बातें करने लगे, ‘इंसान अगर हमेशा बच्चा रह सकता, तो दुनिया कितनी खूबसूरत हो जाती।’ प्रस्तुति : अमिताभ स.

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