क्वींस कॉलेज, वाराणसी के लॉन में गुलाब के फूल मुस्कुरा रहे थे। कॉलेज का एक छात्र काफी देर से गुलाब की शोभा में रम रहा था। इसी दौरान उसने एक गुलाब तोड़ लिया। प्राचार्य का कक्ष पास ही था। छात्र को फूल तोड़ता देख वे उसके पास गए। उन्होंने पीछे से छात्र के कंधे पर हाथ रख दिया, ‘तुमने फूल क्यों तोड़ा?’ छात्र चौंका, लेकिन विनम्रता-पूर्वक बोला, ‘श्रीमान, मुझे पसंद आया, इसलिए तोड़ लिया।’ ‘बेटे, यह बताओ कि वह फूल उस डाल पर सुन्दर लगता था या तुम्हारे हाथ में?’ ‘डाल पर, श्रीमान!’ ‘निःसन्देह यह गुलाब का फूल इस समय सिर्फ तुम्हें खुशी दे रहा है, परन्तु यह डाल पर होता तो हजारों को प्रसन्नता देता।’ यह कहकर प्राचार्य कक्ष में वापस चले गए। यही छात्र आगे चलकर हिन्दी का महाकवि बना। खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य ‘प्रिय प्रवास’ के प्रणेता पंडित अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, जिनके काव्य में प्रकृति-शोभा में एकाकार हो जाने की अद्भुत निष्ठा दिखाई पड़ती है। उन्होंने फिर कभी फूल तो क्या, पत्ती भी न छुई।
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