मतंग ऋषि पशु-पक्षियों के प्रति बहुत स्नेह रखते थे। प्रायः वे अध्ययन और उपासना के बाद पक्षियों के साथ खेलने लग जाते थे। पक्षी इशारों पर उनके पास आ जाते और उनके कंधों व हाथों पर बैठ जाते थे। एक दिन जब वे पक्षियों के बीच चहक रहे थे, तभी अनंग ऋषि वहां आए। वह मतंग ऋषि का बहुत सम्मान करते थे। उन्हें पक्षियों के साथ खेलते देखकर वे बोले, ‘महाराज! आप इतने बड़े विद्वान होकर बच्चों की तरह चिड़ियों के साथ खेल रहे हैं। इससे आपका मूल्यवान समय नष्ट नहीं होता?’ मतंग ऋषि यह सुनकर मुस्करा दिए और उन्होंने पास रखे धनुष की डोरी ढीली करके रख दी। अनंग ऋषि बोले, ‘आपने इस धनुष की डोरी को ढीली करके क्यों रख दिया?’ मतंग ऋषि बोले, ‘हमारा मन धनुष की तरह है। यदि धनुष पर डोरी हमेशा चढ़ी रहे तो उसकी मजबूती कुछ ही समय में चली जाती है और वह जल्दी टूट जाता है, किंतु यदि डोरी काम पड़ने पर ही चढ़ाई जाए तो वह अधिक समय तक टिकता है। इसी प्रकार मन को काम के बाद यदि आराम मिलता रहे तो इससे मन स्वस्थ और मजबूत बनता है।’ मतंग ऋषि का उत्तर सुनकर अनंग ऋषि बोले, ‘मैं आपकी बात समझ गया। अब मालूम हुआ कि आप हर क्षेत्र में सफल कैसे हैं।’
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