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पंचरंगा झंडे के संदेशक और समाज सुधारक

स्वामी ब्रह्मानन्द 118वीं जयन्ती

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गुरु ब्रह्मानन्द जी एक धार्मिक गुरु एवं संत कवि के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वे वैदिक धर्म के प्रचार के साथ-साथ नारी शिक्षा के पक्षधर थे। गुरु जी चाहते थे कि समाज में नारी का उत्थान हो।

कुरुक्षेत्र के अड़तालिस कोस में कई पवित्र स्थल हैं, जिनमें से एक गांव चूहड़माजरा है, जो अब कैथल जिले में स्थित है। इसी गांव में रोड़ क्षत्रिय जाति में 24 दिसम्बर, सन‌् 1908 ई. तदनुसार पौष सुदी प्रतिपदा, विक्रमी संवत 1965, दिन बृहस्पतिवार को जगत‌्गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द का जन्म हुआ। इनकी माता का नाम श्रीमती रामीदेवी और पिता जी का नाम चौ. बदामा राम था।

स्वामी ब्रह्मानन्द जी की ‘ब्रह्मानन्द पचासा’, ‘ब्रह्मविचार’, ‘नीतिविचार’, ‘शारीरिकोपनिषद्’ और ‘गौरक्षा’ नाम से पांच पुस्तकें हैं। इन पुस्तकांे में स्वामी ने वेद-वेदान्त परंपरा, दार्शनिक परंपरा और अध्यात्म के गूढ़ विषयों को सरलतम ढंग से प्रस्तुत किया है।

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उन्होंने समाज को अपने साहित्य द्वारा कर्म, ज्ञान एवं उपासना की त्रिवेणी में स्नान कराकर लौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान को साररूप में प्रस्तुत किया। निःसंदेह, स्वामी जी ने अपने युग की जनता की इच्छा-आकांक्षाओं के अनुरूप ब्रह्मयोग, कर्मयोग और ज्ञानयोग की शिक्षाएं अपने साहित्य के माध्यम से प्रभावी ढंग से पहुंचाईं। यदि एक ओर उनके साहित्य की यह शिक्षाएं तत्कालीन युग की हरियाणा की जनता को अमृत पिला रही थीं, तो दूसरी ओर उनकी जीवन विषयक संबंधी यह शिक्षाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

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स्वामी जी ने अपने पंचरंगे झंडे से कई तरह के संदेश दिए हैं। उनके अनुसार यह पंचरंगा झंडा पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु—इन पांच तत्वों का प्रतीक है, जिससे मनुष्य का शरीर बना। इस झंडे को फहरा कर मनुष्य अपने पांच विकारों—काम, क्रोध, मद, लोभ, अहंकार—को समाप्त कर सकता है। यह पंचरंगा झंडा सभी जातियों, धर्मों, संप्रदायों और वर्गों के लोगों का है, जो समाज में आपसी भाईचारे, समरसता और सद्भावना का संदेश देता है। यह झंडा सम्पूर्ण मानवता का प्रतीक है, जो समूचे विश्व को आजादी का संदेश देता है। स्वामी जी के अनुसार, गीता में वर्णित कर्मयोग का संदेश, जब से सृष्टि आरंभ हुई और जब तक रहेगी, तब तक प्रासंगिक रहेगा। हम जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, वहां हमें धर्म की पालना ईमानदारी और निष्ठा के साथ करनी चाहिए। स्वामी जी का कहना था कि मनुष्य का भाग्य कर्म से बनता है, कर्म से ही वह राजा बनता है, महात्मा बनता है। कर्म से ही उसे तेज मिलता है।

गुरु ब्रह्मानन्द जी एक धार्मिक गुरु एवं संत कवि के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वे वैदिक धर्म के प्रचार के साथ-साथ नारी शिक्षा के पक्षधर थे। गुरु जी चाहते थे कि समाज में नारी का उत्थान हो। यह तभी संभव होगा जब नारी शिक्षित होगी। इसलिए नारी में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए समाज का सुशिक्षित और विरक्त होना आवश्यक था।

गुरु जी घुमक्कड़ प्रकृति के संत थे। पूरे देश में जगह-जगह वे भंडारों का आयोजन करते थे, जिससे गरीब और भूखे लोगों को भोजन प्राप्त होता था। दीन, हीन और मलीन के प्रति गुरु जी के मन में अथाह स्नेह था, क्योंकि वे भगवान द्वारा बनाए प्रत्येक बंदे को समान मानते थे। भंडारों के साथ-साथ गुरु जी हवन-यज्ञ भी करवाते थे। उनकी सोच थी कि हवन-यज्ञ से न केवल मनुष्य का मन और मस्तिष्क शुद्ध होगा, बल्कि पर्यावरण भी स्वच्छ रहेगा।

गुरु जी भारतीय संस्कृति की तत्व-मानवतावादी विचारधारा और विश्वबंधुत्व के पक्षधर थे। वे समस्त संसार को एक कुटुंब मानते थे और किसी को भी पराधीन नहीं देखना चाहते थे। वे देश के लोगों को स्वतंत्र और सुखी देखना चाहते थे। वे केवल भारतीयों की स्वतंत्रता के पक्षधर ही नहीं, बल्कि समूची मानव जाति की स्वतंत्रता के समर्थक थे। उन्होंने समाज को विश्वबंधुत्व एवं मानवतावादी विचारधारा पर आधारित पंचरंगा झंडा दिया। गुरु जी के समय में देश पराधीनता की बेड़ियों में बंधा हुआ था। उन्होंने स्वतंत्रता का आह्वान किया और अपने कवि-कर्म एवं राष्ट्रीय भक्ति का निर्वहन किया।

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