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महाशिवरात्रि में जीवन के समभाव का संदेश

शिव की सर्वसमावेशी प्रकृति है, वे किसी एक वर्ग, मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां शिवलिंग या शिव-स्थल न हो। वृक्ष के नीचे स्थापित शिवलिंग भी उतना ही पूज्य है,...

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शिव की सर्वसमावेशी प्रकृति है, वे किसी एक वर्ग, मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां शिवलिंग या शिव-स्थल न हो। वृक्ष के नीचे स्थापित शिवलिंग भी उतना ही पूज्य है, जितना किसी भव्य मंदिर का गर्भगृह क्योंकि शिव भाव के देव हैं।

जब फाल्गुन की कृष्ण चतुर्दशी की वेला आती है, तब संपूर्ण चराचर जगत में एक विलक्षण स्पंदन सुनाई देता है ‘हर-हर महादेव’। यह केवल एक ध्वनि नहीं बल्कि उस अनंत चेतना का उद्घोष है, जिसे हम ‘शिव’ कहते हैं। महाशिवरात्रि केवल एक व्रत, उत्सव या धार्मिक पर्व नहीं है बल्कि चेतना के उस महासंगम का नाम है, जहां आस्था, तप, वैराग्य और करुणा एक साथ प्रवाहित होते हैं। यह वह संधि-काल है, जब जीव का शिव से, आत्मा का परमात्मा से और प्रकृति का पुरुष से मिलन होता है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने वाली वह रात्रि है, जो मनुष्य को उसके भीतर छिपे ‘शिवत्व’ का आभास कराती है। यह वह पावन रात्रि है, जब शिव-तत्व अपने चरम पर होता है और साधक अपने भीतर के अज्ञान, भय और तमस को त्यागकर आत्मबोध की ओर अग्रसर होता है।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि इस वर्ष 15 फरवरी को है। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में यह रात्रि उतनी ही जीवंत है, जितनी सृष्टि की धड़कन क्योंकि शिव केवल देव नहीं, स्वयं जीवन की गति, स्थिरता और लय हैं। शिव को किसी एक परिभाषा, किसी एक रूप या किसी एक दर्शन में बांधना संभव नहीं। वे स्वयं जीवन के समस्त विरोधाभासों का समन्वय हैं। शिव का स्वरूप अद्वितीय है, वे आदियोगी हैं, जिन्होंने मानव को योग, ध्यान और आत्मबोध का मार्ग दिखाया, वे संहारक हैं, जो विनाश के माध्यम से नवसृजन का द्वार खोलते हैं। वे करुणा के महासागर भोलेनाथ हैं, जिन्हें न वैभव चाहिए, न आडंबर, बस एक लोटा जल और एक बेलपत्र ही उनकी भक्ति का पूर्ण रूप है। वे नीलकंठ हैं, जिन्होंने सृष्टि की रक्षा के लिए हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और स्वयं पीड़ा सहकर जगत को जीवनदान दिया। वे नटराज हैं, जिनका तांडव यह सिखाता है कि सृजन और विनाश एक ही चक्र के दो चरण हैं और वे अर्द्धनारीश्वर हैं, जो पुरुष और स्त्री के समान अस्तित्व, संतुलन और सह-अस्तित्व का दार्शनिक संदेश देते हैं।

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शिव का स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही गूढ़ भी। उनके मस्तक पर शीतल चंद्रमा है तो ललाट पर प्रलयंकर तीसरा नेत्र। जटाओं में जीवनदायिनी गंगा प्रवाहित है तो शरीर पर श्मशान की भस्म। गले में विषैले सर्प हैं पर हृदय में समस्त प्राणियों के लिए अपार करुणा। यही विरोधाभास शिव को साधारण देव नहीं, जीवन-दर्शन बना देता है। शिव केवल देव नहीं, स्वयं जीवन की गति और लय हैं, जो विरोधाभासों में भी सामंजस्य सिखाते हैं। शिव की उपासना बाह्य आडंबर से नहीं, अंतर्मन की शुद्धता से होती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि को आध्यात्मिक उत्कर्ष का सर्वोत्तम अवसर माना गया है, जहां साधक रात्रि जागरण, उपवास और ध्यान के माध्यम से शिव-तत्व को आत्मसात करता है। शिव सिखाते हैं कि सुख-दुख, विष-अमृत, हानि-लाभ और शीत-ताप को समभाव से स्वीकार करना ही शिवत्व है।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन की स्मृति है। यह दांपत्य के आदर्श, संतुलन और सहचर्य का पर्व भी है। माना जाता है कि इस दिन विधि-विधान से शिव पूजन, जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक करने से साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवपुराण में वर्णित है कि महाशिवरात्रि की रात्रि चार प्रहरों में की गई पूजा अक्षय पुण्य प्रदान करती है और मोक्ष की दिशा में साधक को अग्रसर करती है। शिव को ‘कालों का काल’ कहा गया है, वे समय के भी स्वामी हैं। उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र, जटाओं में प्रवाहित गंगा, कंठ में धारण किया विष और तीसरा नेत्र, ये सभी प्रतीक केवल पौराणिक कथाएं नहीं, गहन दार्शनिक संकेत हैं। समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान कर शिव ने सृष्टि की रक्षा की, यही त्याग और करुणा का परम उदाहरण है। नीलकंठ का यह स्वरूप बताता है कि जो जगत का विष स्वयं पी ले, वही सच्चा कल्याणकारी है।

भस्म से लिपटा शरीर, गले में सर्पों का हार, वाहन नंदी और गणों की संगति, शिव का सौंदर्य अलौकिक है। वे समाज के हाशिये पर खड़े प्राणियों, भूत-प्रेतों और तपस्वियों के भी आराध्य हैं। यही शिव की सर्वसमावेशी प्रकृति है, वे किसी एक वर्ग, मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां शिवलिंग या शिव-स्थल न हो। वृक्ष के नीचे स्थापित शिवलिंग भी उतना ही पूज्य है, जितना किसी भव्य मंदिर का गर्भगृह क्योंकि शिव भाव के देव हैं।

आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टियों से यह रात्रि विशेष मानी गई है क्योंकि इस समय मानव शरीर की ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। रीढ़ को सीधा रखकर किया गया जागरण आत्मिक उन्नति की वह सीढ़ी है, जहां से भक्ति बंधन नहीं, मुक्ति का मार्ग बन जाती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण को विशेष महत्व दिया गया है। यह बाह्य निद्रा से जागकर अंतःचेतना को जागृत करने का प्रतीक है।

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