Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Grand Independence Day Sale
search-icon-img
Advertisement

शहादत और क्रांति

एकदा

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

वर्ष 1913 में संपूर्ण देश अंग्रेजों के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। इसमें आदिवासी भी शामिल थे। महान सामाजिक और आध्यात्मिक सुधारक गोविंद गुरु ने ‘भगत आंदोलन’ के जरिए भील आदिवासियों को संगठित किया। उन दिनों आदिवासी अंग्रेजों द्वारा थोपे गए बेगार, भारी लगान और स्थानीय राजाओं-सामंतों के शोषण के खिलाफ अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे। यह अंग्रेजों को ब्रिटिश हुकूमत के लिए खतरा लगने लगा। 17 नवंबर, 1913 को आदिवासी मानगढ़ की पहाड़ियों पर शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन कर रहे थे, तभी ब्रिटिश सेना और स्थानीय रियासतों की संयुक्त टुकड़ियों ने आदिवासियों को चारों ओर से घेर लिया और उन पर अंधाधुंध गोलियां व तोपें बरसाईं। इस बर्बरतापूर्ण हिंसा में लगभग 1500 निर्दोष भील और बंजारा आदिवासी शहीद हो गए थे। इस हिंसक नरसंहार को ‘आदिवासी जलियांवाला बाग’ के नाम से भी जाना जाता है। मगर अंग्रेजों के अनेक अत्याचारों के बाद भी जन-जन में क्रांति की लहर जगी और पूरा देश एक सूत्र में बंधता गया। आखिर 15 अगस्त सन‍् 1947 को अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा।

Advertisement
Advertisement
×