गोपबंधु दास को हम ‘उत्कल-मणि’ के नाम से भी जानते हैं। उन्होंने पूरा जीवन निराश्रितों, पीड़ितों व शोषितों की भलाई करने में बिता दिया। एक बार उनके पड़ोस के गांव में भीषण आग लग गई। गोपबंधु दास अपने छात्रों व शिक्षकों के संग फौरन आग बुझाने पहुंचे। उन्होंने जी-जान से आगजनी में फंसे पीड़ितों की मदद की और लौट आये। घटना के दो रोज़ बाद आधी रात को अचानक तेज आंधी और वर्षा होने लगी। मूसलाधार बारिश के बीच सहसा कहीं से रोने की आवाज आने लगी। कोई दबे स्वर में रो रहा था। छात्रालय में अधेड़ हरिहर दास की नींद सबसे पहले टूटी। हरिहर की सतर्क निगाहें पांच-छह कमरे पार कर अटक गयी। उसने तेजी से बढ़कर किवाड़ खटखटाये। यह क्या? दास जी रो रहे थे। वे सहम गये। इस दौरान सब छात्र इकट्ठे हो गये। सब अवाक् थे कि यह क्या हो गया? दास जी किस वजह से रोए। आखिर हरिहर ने ही हिम्मत करके पूछा, ‘दास जी, आप क्यों रो रहे हैं?’ दास जी सुबकते हुए उदास स्वर में बोले, ‘हरिहर! मैं यहां छत के नीचे आराम से लेटा हूं। दो दिन पहले पास के गांव में जिन-जिन लोगों के घर जल गये थे वे अपने बाल-बच्चों और पशुओं को लेकर कहां आसरा खोज रहे होंगे? इसी चिन्ता के चलते मैं रो रहा हूं।’
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