एक दिन द्वारका में उद्धव ने श्रीकृष्ण से पूछा, ‘हे माधव! संसार में लोग अक्सर मोह को ही प्रेम समझ लेते हैं। कृपया बताइए, प्रेम और मोह में वास्तविक अंतर क्या है?’ श्रीकृष्ण बोले, ‘उद्धव, मोह कहता है— ‘तुम मेरे हो।’ और प्रेम कहता है— ‘मैं तुम्हारा हूं।’ मोह किसी को बांधना चाहता है, जबकि प्रेम उसे स्वतंत्र देखकर भी प्रसन्न रहता है। मोह अधिकार चाहता है, प्रेम समर्पण करता है। मोह खोने से डरता है, जबकि प्रेम विश्वास करना सिखाता है।’ उद्धव ने पूछा, ‘प्रभु! फिर लोग मोह को ही प्रेम क्यों समझ बैठते हैं?’ श्रीकृष्ण बोले, ‘क्योंकि मोह में ‘मैं’ अधिक होता है और प्रेम में ‘तुम’। जहां स्वार्थ समाप्त हो जाता है, वहीं से प्रेम का आरंभ होता है।’ श्रीकृष्ण ने कहा, ‘देखो उद्धव, मां का अपने बच्चे के लिए नि:स्वार्थ त्याग प्रेम है। मित्र का बिना किसी अपेक्षा के साथ निभाना प्रेम है। लेकिन किसी को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की ज़िद— वह मोह है।’ श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, ‘उद्धव, जहां प्रेम होता है, वहां मन को शांति मिलती है। जहां मोह होता है, वहां भय, अपेक्षाएं और दुःख जन्म लेते हैं। इसलिए प्रेम करो, लेकिन किसी को अपने बंधन में बांधने का प्रयास मत करो।’
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