एक गुरुकुल में एक प्रतिभाशाली शिष्य था। वह बहुत पढ़ता था, बहुत जानता था, लेकिन उसके मन में स्थिरता नहीं थी। मन हमेशा असंतुष्ट रहता। एक दिन उसने गुरु से कहा— ‘गुरुदेव, ज्ञान तो बहुत है, फिर भी भीतर खालीपन क्यों है?’ गुरु उसे आश्रम के पीछे ले गए। वहां पानी से भरा एक घड़ा रखा था, लेकिन नीचे से वह धीरे-धीरे रिस रहा था। गुरु ने पूछा— ‘क्या यह घड़ा भरा है?’ शिष्य बोला— ‘अभी तो हां, पर थोड़ी देर में खाली हो जाएगा।’ गुरु बोले— ‘यही तुम्हारी स्थिति है।’ उन्होंने कहा— ‘तुम ज्ञान इकट्ठा करते हो, लेकिन अनुशासन नहीं रखते। विचार रखते हो, पर आचरण में नहीं उतारते। जिस जीवन में संकल्प का आधार नहीं, वह ज्ञान से भरा होकर भी अंदर से खाली रहता है।’ गुरु ने घड़े का छेद बंद किया। कुछ देर बाद घड़े का पानी स्थिर हो गया। गुरु बोले—’ज्ञान तभी शक्ति बनता है जब वह चरित्र में ठहरता है। अन्यथा वह सिर्फ़ बोझ बन जाता है।’ उस क्षण शिष्य को समझ आया—समस्या ज्ञान की कमी की नहीं थी, समस्या स्थिरता की कमी थी।
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