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मन की शांति से उजाला

एकदा

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एक बार एक प्रतापी राजा एक घने जंगल में भटक गया। वहां उसे एक गुफा में एक सिद्ध महात्मा ध्यान में लीन मिले। राजा ने पूछा, ‘महात्मा जी, इस घोर अंधेरे में आप बिना दीपक के कैसे बैठे हैं?’ महात्मा ने अपनी आंखें खोलीं और कहा, ‘दीपक बाहर जलता है तो केवल मिट्टी की दीवारें दिखाता है, लेकिन जब दीपक भीतर जलता है तो पूरा ब्रह्मांड दिखाई देता है।’ राजा ने आश्चर्य से पूछा, ‘भीतर का दीपक कैसे जलता है?’ महात्मा बोले, ‘जब मनुष्य अपनी इच्छाओं का तेल खत्म कर देता है और केवल संतोष की बाती जलाता है, तब ज्ञान का वह प्रकाश होता है जिसे कोई हवा नहीं बुझा सकती।’ राजा को समझ आ गया कि महल की रोशनी से बड़ी मन की शांति है।

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