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भीतरी स्थिरता से प्रकाश

एकदा

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एक गांव के मंदिर में रोज़ शाम एक छोटा-सा दीपक जलाया जाता था। मंदिर ऊंचाई पर था, इसलिए वहां हवा हमेशा तेज़ चलती थी। कई बार पुजारी सोचता—‘इतनी हवा में यह दीपक जलाना व्यर्थ है, कुछ ही देर में बुझ जाएगा।’ एक दिन आंधी आ गई। लोगों ने कहा— ‘आज दीपक मत जलाइए, हवा बहुत प्रचंड है।’ लेकिन पुजारी ने दीपक जलाया—और उसे एक कांच की छोटी लालटेन में रख दिया। हवा चली और तेज़ चली, लेकिन दीपक बुझा नहीं। रात में दूर-दूर से आने वाले यात्रियों ने उसी छोटे दीपक की रोशनी देखकर मंदिर का रास्ता पाया। अगली सुबह पुजारी ने कहा—’समस्या हवा नहीं थी, समस्या तैयारी की कमी थी। जब दीपक को सही आवरण मिला, तो वही हवा उसकी रोशनी को दूर तक फैलाने लगी।’ जीवन में विरोध, आलोचना और कठिनाइयां हवा की तरह हैं—वे हर किसी के लिए चलती हैं, जो बिना तैयारी के है, वह बुझ जाता है। और जो भीतर से मजबूत है, वही विपरीत परिस्थितियों में दूसरों के लिए प्रकाश बनता है। बल बाहर से नहीं, भीतर की स्थिरता से आता है।

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